बहुत दूर
रेत और नमक के बीच
एक राज्य था—
नाम अब इतिहास की धूल में दब चुका है।
किसी प्राचीन नक़्शे पर
वह शायद अब भी
एक धुँधले दाग़ की तरह मौजूद हो,
पर वहाँ के लोग
उसे “स्वर्णभूमि” कहते थे।
हालाँकि
उनकी थालियों में
अक्सर अनाज नहीं होता था।
—
उस राज्य का राजा
अद्भुत वक्ता था।
इतना अद्भुत
कि अकाल को भी
उत्सव की तरह सुनाया जा सकता था।
वह जब बोलता
तो भूखे लोग
अपनी पसलियाँ भूल जाते,
बेरोज़गार युवक
अपनी जेबों की खाली हवा को
राष्ट्रगान समझने लगते।
राजा कहता—
“हम महान हैं।”
और जनता
इतनी बार यह सुन चुकी थी
कि अंततः
उसे अपनी दरिद्रता भी
राष्ट्रीय गौरव लगने लगी।
—
उसने सबसे पहले
इतिहास बदला।
क्योंकि वर्तमान से लड़ना कठिन था।
उसने पुराने योद्धाओं की मूर्तियाँ ऊँची कर दीं,
ताकि लोग
अपने वर्तमान कद को देख ही न सकें।
विद्यालयों में
भूगोल से अधिक
गौरव पढ़ाया जाने लगा।
बच्चों को सिखाया गया
कि प्रश्न पूछना
विदेशी षड्यंत्र है।
धीरे-धीरे
पूरे राज्य में
जिज्ञासा की जगह
जयकार ने ले ली।
और यह परिवर्तन
इतना शांत था
कि किसी को रक्त की गंध तक नहीं आई।
—
राजा ने कहा—
“शत्रु बाहर नहीं,
तुम्हारे पड़ोस में है।”
बस फिर क्या था—
लोगों ने
रोटियों से अधिक
एक-दूसरे की पहचानें गिननी शुरू कर दीं।
मोहल्ले
धीरे-धीरे
कब्रिस्तानों की तरह शांत होने लगे।
जहाँ पहले बच्चे खेलते थे
अब वहाँ लोग
एक-दूसरे के नामों का धर्म खोजते थे।
—
राजा बहुत चतुर था।
उसे पता था
कि भूखी जनता
अंततः प्रश्न पूछेगी।
इसलिए उसने
हर सप्ताह
एक नया तमाशा बनाया।
कभी सीमा का भय,
कभी प्राचीन अपमान,
कभी किसी कवि का अपराध,
कभी किसी छात्र की आवाज़।
जनता
हर दिन
एक नई आग की तरफ़ दौड़ती रही।
और इसी बीच
उनके घरों की रसोई
धीरे-धीरे ठंडी होती गई।
—
राज्य में
सब कुछ बिकने लगा।
नदियाँ।
जंगल।
पहाड़।
यहाँ तक कि
मनुष्य का समय भी।
लोग काम करते रहे
पर उनका श्रम
उनकी मुट्ठी में नहीं लौटता था।
वे जितना भागते
उतना ही पीछे छूट जाते।
और राजा
हर शाम
महलों की ऊँची बालकनी से
उन्हें “विश्वगुरु” कहकर संबोधित करता।
—
फिर एक दिन
राजा ने दर्पणों पर कर लगा दिया।
क्योंकि उसे डर था
कि लोग
अपना असली चेहरा देख लेंगे।
अब राज्य में
सिर्फ़ वे दर्पण वैध थे
जो राजा की छवि दिखाते थे।
समाचार
दरबार के बाजे बन गए।
कवि
धीरे-धीरे
विज्ञापन लिखने लगे।
और बुद्धिजीवी—
वे दो हिस्सों में बँट गए:
कुछ बिक गए,
बाक़ी देशद्रोही कहलाए।
—
सबसे भयावह समय तब आया
जब जनता ने
अपने ही दुख पर हँसना सीख लिया।
बेरोज़गारी
मज़ाक बन गई।
महँगाई
देशभक्ति।
भय
अनुशासन।
लोग मरते थे
और अगले दिन
उसी मृत्यु के वीडियो पर
देशभक्ति के गीत लगा दिए जाते।
इतिहास में
सभ्यताएँ अचानक नहीं मरतीं—
वे पहले
अपनी संवेदना खोती हैं।
—
फिर धीरे-धीरे
राज्य में
पेड़ कम होने लगे।
नदियाँ सिकुड़ गईं।
विश्वविद्यालयों में
विचार की जगह
घोषणाएँ पढ़ाई जाने लगीं।
युवाओं की आँखों से
भविष्य गायब हो गया,
पर उनके हाथों में
झंडे बहुत चमकदार थे।
राजा प्रसन्न था।
क्योंकि उसे पता था—
जिस जनता के हाथ
लगातार हवा में व्यस्त हों,
वे कभी
प्रश्न लिख नहीं सकते।
—
और फिर
एक सुबह
राजा मर गया।
इतिहास में
हर तानाशाह अंततः मरता है।
पर असली त्रासदी यह नहीं थी।
त्रासदी यह थी
कि उसके जाने के बाद भी
लोगों के भीतर
उसकी आवाज़ जीवित रही।
वे अब भी
एक-दूसरे से डरते थे।
अब भी
सवाल से घबराते थे।
अब भी
भूख से अधिक
पहचान पर लड़ते थे।
राजा मर चुका था,
पर उसका बनाया हुआ अंधकार
जनता की चेतना में
स्थायी नागरिकता पा चुका था।
—
और इतिहास की सबसे भयानक बात यही है—
कई बार
तानाशाह देश को उतना नष्ट नहीं करता
जितना वह
मनुष्य के भीतर के मनुष्य को कर देता है।
उसके बाद
सभ्यताएँ बाहर से जीवित दिखती हैं,
पर भीतर से
वे धीरे-धीरे
स्मृति खोती हुई आत्माएँ बन जाती हैं।
और तब
राज्य नहीं बचते—
सिर्फ़ भीड़ बचती है।
जयकार करती हुई।
भूखी।
भयभीत।
और अपनी ही जंजीरों को
उत्सव समझती हुई।

