मनुष्य
अक्सर चलता नहीं,
चलाया जाता है।
उसकी सुबहें
पहले से लिखी हुई होती हैं।
उसकी प्रतिक्रियाएँ
पुरानी रिकॉर्डिंगों की तरह दोहराती रहती हैं।
वह सोचता है—
“मैं निर्णय ले रहा हूँ।”
पर अधिकांश समय
निर्णय नहीं,
आदतें जी रही होती हैं।
मस्तिष्क
एक दक्ष मशीन है।
वह हर अनुभव को
धीरे-धीरे
एक रास्ते में बदल देता है।
फिर वही रास्ता
बार-बार चलने लगता है।
एक ही क्रोध।
एक ही भय।
एक ही दुख।
एक ही प्रकार का प्रेम।
यहाँ तक कि
मनुष्य की मुस्कान भी
कई बार
सिर्फ एक अभ्यास रह जाती है।
और तभी
“रुकना”
एक साधारण क्रिया नहीं रहता।
वह
चेतना का विद्रोह बन जाता है।
जब तुम
अचानक रुकते हो—
बिना कारण,
बिना लक्ष्य,
बिना अगली गतिविधि की ओर भागे—
तब भीतर
कुछ विचलित होता है।
आदतों की पूरी मशीनरी
एक क्षण के लिए
अपना संतुलन खो देती है।
शुरू में
बेचैनी उठती है।
क्योंकि मन
रुकना नहीं जानता।
वह तुरंत
कोई विचार लाएगा,
कोई स्मृति,
कोई योजना,
कोई स्क्रीन,
कोई शोर।
उसे भय है—
यदि तुम सचमुच रुक गए,
तो उसकी पकड़ दिखाई देने लगेगी।
रुकना
मस्तिष्क के लिए
वैसा ही है
जैसे तेज़ घूमते पंखे के सामने
अचानक बिजली बंद कर दी जाए।
कुछ देर तक
पुरानी गति
चलती रहती है।
फिर धीरे-धीरे
घूमना कम होता है।
और तब
पहली बार
तुम पंखे को नहीं,
उसकी धुरी को देख पाते हो।
मनुष्य ने
हर चीज़ सीखी—
दौड़ना,
कमाना,
बचना,
सिद्ध होना।
पर रुकना नहीं सीखा।
क्योंकि रुकते ही
भीतर का छिपा हुआ संसार
दिखने लगता है।
वे घाव
जिन्हें गतिविधि ढँक रही थी।
वे भय
जो व्यस्तता के नीचे दबे थे।
वे खालीपन
जिनसे बचने के लिए
पूरी सभ्यता बनाई गई।
इसलिए
दुनिया निरंतर
मनुष्य को गतिशील रखती है।
क्योंकि जो मनुष्य
सचमुच रुक जाता है,
वह धीरे-धीरे
अनुकूलित मशीन नहीं रहता।
वह देखने लगता है।
और देखना
सबसे खतरनाक स्वतंत्रता है।
एक दिन
बस चलते-चलते
अचानक रुक जाना।
सड़क के किनारे।
किसी पेड़ के नीचे।
कमरे के बीचोंबीच।
और कुछ क्षण
कुछ मत करना।
तुम पाओगे—
भीतर
सैकड़ों अदृश्य लूप
तुम्हें फिर से चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
कोई कहेगा—
“समय बर्बाद हो रहा है।”
कोई कहेगा—
“कुछ उत्पादक करो।”
कोई कहेगा—
“यह व्यर्थ है।”
पर यदि तुम
उन आवाज़ों को देख सको
और फिर भी
रुके रह सको,
तो धीरे-धीरे
एक नई जगह जन्म लेती है।
वह जगह
आदत और प्रतिक्रिया के बीच की रिक्ति है।
उसी रिक्ति में
चेतना पहली बार
स्वतंत्र साँस लेती है।
रुकना
समय खोना नहीं है।
यह
अपने को वापस पाना है।
और शायद
ज्ञान का आरंभ भी
किसी महान उत्तर से नहीं,
एक गहरे रुकने से होता है।
इतना गहरा
कि भीतर की स्वचालित मशीनें
धीरे-धीरे शांत पड़ जाएँ।
और तब
जो बचे—
वह आदत नहीं,
वह तुम हो।

