अब बच्चे पैदा नहीं होते,
तैयार किए जाते हैं।
जन्म के तुरंत बाद
उनकी आँखों में आकाश नहीं,
भविष्य ठूँस दिया जाता है।
उनके छोटे-छोटे हाथों में
मिट्टी नहीं दी जाती,
सिलेबस दे दिया जाता है।
और वे बोलना सीखने से पहले
प्रतिस्पर्धा सीख जाते हैं।
एक समय था
जब बचपन पेड़ों पर चढ़ता था,
बारिश में भीगता था,
चींटियों को घंटों देखता था,
और बादलों में जानवर खोजता था।
अब बचपन
कोचिंग की ट्यूबलाइटों के नीचे बैठा
अपनी ही धड़कनों से कट गया है।
जीवन खिलने से पहले ही
इत्र की शीशी में कैद कर दिया गया।
इतनी छोटी बोतल
और उसमें बंद
पूरा आकाश।
बच्चों को सिखाया गया—
फूल मत बनो,
सुगंध बनो।
क्योंकि बाज़ार को
पेड़ नहीं चाहिए,
परफ्यूम चाहिए।
अब कोई यह नहीं पूछता
कि बच्चा किस चीज़ पर चकित होता है।
पूछा जाता है—
उसका IQ कितना है?
उसका package क्या होगा?
वह कितनी जल्दी सफल होगा?
जैसे आत्मा नहीं,
कोई स्टार्टअप पैदा हुआ हो।
और बुढ़ापा?
उसे भी उपयोगिता की अदालत में खड़ा कर दिया गया।
जिस शरीर ने जीवनभर
दुनिया को ढोया,
उसी से अंत में पूछा गया—
“अब तुम्हारे काम का क्या बचा?”
धीरे-धीरे बूढ़े लोग
घर के कमरों से नहीं,
परिवार की प्राथमिकताओं से गायब होने लगे।
उनकी धीमी चाल
तेज़ समय को असुविधाजनक लगने लगी।
यह कैसी सभ्यता है
जहाँ बचपन को भविष्य खा जाता है
और बुढ़ापे को वर्तमान?
जहाँ जीवन के दोनों सिरों को
अक्षम घोषित कर दिया गया है।
एक अभी उपयोगी नहीं,
दूसरा अब उपयोगी नहीं।
और बीच का आदमी
उपयोगी बने रहने के आतंक में
धीरे-धीरे मरता रहता है।
अब बच्चे
पेन्सिल से चित्र नहीं बनाते,
वे performance graphs बनाते हैं।
वे हारने से पहले ही
डरना सीख जाते हैं।
उनकी हँसी तक scheduled हो गई है।
खेल भी skill-development हो गया।
नींद भी productivity के हिसाब से मापी जाने लगी।
एक बच्चा
जब तितली के पीछे भागता है,
तो वह सभ्यता के लिए अनुपयोगी काम कर रहा होता है।
लेकिन शायद
उसी क्षण
वह सबसे अधिक जीवित होता है।
हमने बचपन से उसका बेकार समय छीन लिया।
वही बेकार समय
जहाँ कल्पना जन्म लेती थी।
जहाँ कोई बच्चा
लकड़ी की टहनी को तलवार बना लेता था,
और मिट्टी के ढेले में
पूरा ग्रह देख लेता था।
अब उसके पास
हर चीज़ की असली version है—
बस दुनिया को देखने वाली
आँख नहीं बची।
और एक दिन
यही बच्चे बड़े होकर
बहुत सफल लोग बनेंगे।
वे ऊँची इमारतें बनाएँगे,
तेज़ मशीनें बनाएँगे,
कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाएँगे—
लेकिन शायद
बारिश को देखकर
भीगना भूल जाएँगे।
सभ्यता का सबसे बड़ा पतन
तब शुरू नहीं होता
जब युद्ध होते हैं।
वह तब शुरू होता है
जब बच्चे आकाश को
सिर्फ science project समझने लगते हैं।
और बूढ़े लोग
अपने ही घरों में
धीरे-धीरे फर्नीचर की तरह रख दिए जाते हैं।
इसलिए
यदि इस पृथ्वी को बचाना है
तो सबसे पहले
बचपन को बचाना होगा।
उसे फिर से मिट्टी लौटानी होगी।
बेकार दोपहरें लौटानी होंगी।
पेड़ों पर चढ़ना,
घुटनों का छिलना,
बिना कारण हँसना लौटाना होगा।
क्योंकि मनुष्य
उपयोगिता से नहीं बचता—
विस्मय से बचता है।
और जिस दिन
दुनिया का अंतिम बच्चा
किसी तितली को देखकर
रुकना बंद कर देगा—
उसी दिन
पृथ्वी पूरी तरह मशीन हो जाएगी।

