सोच
कभी अकेली नहीं आती—
वह अपने साथ
अर्थ की अनगिनत परछाइयाँ लाती है,
जैसे कोई हवा
रेत के नीचे छिपे हुए कणों को
धीरे-धीरे जगा दे।
अर्थ भी
शांत नहीं रहता—
वह सोच की तहों में
अदृश्य बीज रख देता है,
जो समय आने पर
अचानक फूट पड़ते हैं।
कौन पहले है—
यह प्रश्न
दोनों के बीच टिक नहीं पाता।
जैसे
कोई लहर पूछे
कि सागर कहाँ से शुरू होता है,
और उत्तर में
सागर खुद लहर बन जाए।
सोच
जब किसी अर्थ को छूती है,
तो उसे खोलती नहीं—
उसे बिखेर देती है,
जैसे कोई हाथ
तारों की धूल को
आकाश में फैला दे।
और उसी बिखराव में
एक अजीब-सी व्यवस्था जन्म लेती है—
बिना किसी नियम के,
पर अपने आप संतुलित।
अर्थ
जब सोच में उतरता है,
तो उसे स्थिर नहीं करता—
उसे हिला देता है,
जैसे किसी गहरे जल में
अचानक कोई पत्थर गिर जाए।
और उस कंपन में
नई दिशाएँ बनती हैं,
जो पहले कहीं थीं ही नहीं।
दोनों
एक-दूसरे को
पूरा नहीं करते—
वे एक-दूसरे को
अधूरा बना देते हैं।
और यही अधूरापन
उनका सबसे गहरा संबंध है।
सोच
अर्थ के भीतर
अराजकता के बीज बोती है—
जो धीरे-धीरे
सभी सीमाओं को ढीला कर देते हैं।
अर्थ
सोच के भीतर
व्यवस्था के बीज रखता है—
जो बिखराव के बीच
एक क्षणिक केंद्र बना देते हैं।
पर कोई बीज
अपनी जगह स्थिर नहीं रहता—
हर अंकुर
अपने ही आधार को बदल देता है।
इसलिए
न अराजकता स्थायी है,
न व्यवस्था—
दोनों
एक-दूसरे की छाया हैं,
जो हर क्षण
अपनी जगह बदलती रहती हैं।
कभी सोच
एक जंगल बन जाती है—
जहाँ रास्ते खुद को खो देते हैं।
कभी अर्थ
एक बिंदु बन जाता है—
जहाँ सब कुछ सिमटकर
एक क्षण को ठहर जाता है।
फिर वही बिंदु
टूट जाता है,
और जंगल
फिर से फैल जाता है।
कोई आरंभ नहीं—
कोई अंत नहीं—
केवल
बीजों का एक गुप्त आवर्तन,
जहाँ हर गिरावट
एक अंकुर है,
और हर अंकुर
एक नई गिरावट।
सोच और अर्थ—
दो नाम हैं
एक ही अनकही प्रक्रिया के,
जो खुद को रचती है,
और उसी क्षण
खुद को भंग भी कर देती है।

