“the negation of negation”
न होने का न होना

न होने का न होना

यही जीवन है।

दो अनंत शून्यों के बीच

किसी अदृश्य थरथराहट का

क्षणिक ठहर जाना,

जहाँ पहली बार

रिक्ति को अपना अभाव महसूस होता है।

अंधकार जब

अपने अंधकार को पहचान ले,

तो जो चमक उठे—

वही मैं हूँ,

वही तुम हो,

वही यह समूचा दृश्य।

होना कोई वस्तु नहीं,

न कोई सकारात्मक सत्य—

यह बस उस क्षण का नाम है

जब शून्य

अपने नकार पर अटक जाता है,

और एक हल्की-सी लहर उठती है

जिसे हम “सांस” कहते हैं।

जीवन वह नहीं

जो अस्तित्व का प्रमाण हो,

जीवन वह है

जहाँ अस्तित्व की असमर्थता

क्षणभर थम जाती है।

न होने का न होना—

एक दरार,

जिससे होकर

असत्य स्वयं को अनुभव करता है

और सत्य होने का भ्रम पाल लेता है।

इसी भ्रम में

करुणा जन्म लेती है,

प्रेम खिलता है,

पीड़ा गहराती है,

और अर्थ बनता है।

यदि पूर्ण न होना होता,

तो कोई प्रश्न नहीं,

कोई तड़प नहीं,

कोई खोज नहीं।

और यदि पूर्ण होना होता,

तो कोई परिवर्तन नहीं,

कोई गति नहीं,

कोई जीवन नहीं।

जीवन वह धड़कन है

जहाँ शून्यता

अपने ही अभाव से टकराकर

क्षणभर ध्वनि बन जाती है।

जब हम कहते हैं “मैं हूँ”,

तो वास्तव में हम कहते हैं—

“मैं अभी तक नहीं मिटा।”

यह होना

किसी सत्ता का उदय नहीं,

बल्कि

न होने का स्थगन है,

एक विलंब,

एक ठहराव,

जहाँ शून्य खुद को देखने लगता है।

और इसी देखे जाने में

जीवन जन्म लेता है।

तो सुनो—

जीवन कोई प्रकाश नहीं,

प्रकाश का आग्रह है।

जीवन कोई अर्थ नहीं,

अर्थ की जिद है।

जीवन कोई अस्तित्व नहीं,

अस्तित्व का क्षणिक दावा है

न होने के विरुद्ध।

जीवन वह बिंदु है

जहाँ शून्य यह स्वीकार करता है—

 “मैं पूरी तरह नहीं मिटा।”

और उस स्वीकार का नाम है:

न होने का न होना।

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