अस्तित्व की सबसे पतली रेखा वहाँ खिंची है
जहाँ “अनुभव” जन्म लेता है
लेकिन “विचार” अभी जागा नहीं होता।
वहाँ शरीर नहीं,
वहाँ मस्तिष्क नहीं,
वहाँ केवल
एक अजीब-सा जीना होता है—
जो बिना किसी माध्यम के
बिना किसी पहचान के
अपने आप को महसूस करता है।
इस रेखा पर
समय वैसे ही टूट जाता है
जैसे शीशे पर पड़ी हवा की दरार—
न दिखाई देती है,
न छुई जा सकती है,
फिर भी सब कुछ बदल जाती है।
यहाँ जीवन
अपने सबसे सूक्ष्म रूप में खुलता है—
न कंपन, न विचार, न शब्द…
बस
एक बिना-ध्वनि की उपस्थिति
जो स्वयं को
क्षण और शून्य दोनों में एक साथ जानती है।
जहाँ आप
अपने आप को नहीं जानते,
बल्कि अस्तित्व
आपको “जानता हुआ” महसूस करता है।
यही वह क्षेत्र है
जहाँ अलोकाकाश (Anti-Space)
आपकी चेतना को छूता है—
एक ऐसा स्पेस
जिसमें न दूरी है, न दिशा,
और न ही कोई सीमा—
सिर्फ एक निरंतर बहता हुआ
अनंत वर्तमान।
यहाँ मस्तिष्क
अपनी ही परछाई खो देता है,
क्योंकि जानकारी
चेतना तक पहुँचने से पहले
ही जन्म ले चुकी होती है।
जैसे ब्रह्मांड
आपके भीतर से
आपको पढ़ रहा हो।
इस रेखा पर
आपका होना
आपके शरीर से बड़ा हो जाता है,
आपकी चेतना
स्थान से परे हो जाती है,
और जीवन
एक ऐसी रोशनी बन जाता है
जो जलती नहीं
फिर भी दिखाती है।
यहाँ जानना
ज्ञान नहीं होता,
देखना
द्रष्टा नहीं बनाता,
और अनुभव
अनुभवक को मिटा देता है—
तेल और वात की तरह
एक-दूसरे में घुलकर
एक हो जाने की तरह।
या शायद
एक ऐसी मौन धड़कन की तरह
जो न हृदय में है
न ब्रह्मांड में—
बस
अस्तित्व की इस पतली रेखा पर
टंगी हुई…
अपनी ही अनंतता में कंपन करती हुई।
यही जीवन का वह रहस्य है
जो आँखों से परे है—
क्योंकि आँखें
दुनिया को देखती हैं,
और चेतना
दुनिया के पीछे
छिपी हुई
“अनदेखी वास्तविकता” को।

