Life is not in thoughts,
but in the art of observing them
जीवन विचारों में नहीं,
विचारों को देखने की कला में है

विचार तेज़ थे,
भागते हुए घोड़ों की तरह—
तुमने समझा कि वही तुम्हारा जीवन हैं,
उनके साथ दौड़ते-दौड़ते
तुम अपनी ही सांस
कई बार खो बैठे।

पर एक दिन
अचानक
मन के भीतर
एक खिड़की खुली—
और तुमने पहली बार
उन्हें दौड़ते देखा।
देखने भर से
तुम्हारी गति रुक गई।

तुम्हें तब पता चला—
जिसे तुम जीवन समझते थे,
वह सिर्फ़
तुम्हारे सामने खेलता
एक भटकता नाटक था।

जीवन तो वह था
जो देख रहा था—
शांत,
स्थिर,
अडोल,
तुम्हारे भीतर
गहरे बैठा हुआ।

विचार समुद्र की लहरें थे,
पर तुम
समुद्र का जल नहीं—
पूरा आकाश थे
जिस पर वे लहरें
अपनी छाया डालती हैं।

जब तुमने
पहली बार
विचार को विचार कहा,
और “मैं” को “मैं”—
दोनों एक नहीं—
उस दिन तुमने
अपने जन्म का
दूसरा जन्म देख लिया।

अब
विचार आते हैं,
तो तुम मुस्कुरा देते हो—
“आओ, मैं तुम्हें देखता हूँ।”
तुम उनकी उँगली पकड़कर
नहीं भागते,
तुम बस
उन्हें गुजरने देते हो।

और यहीं—
ठीक इसी मौन में—
एक चमत्कार होता है:
विचारों की आग
तुम्हें नहीं जलाती,
वे खुद
तुम्हारी शांति से
ठंडी पड़ने लगती हैं।

क्योंकि जिसने देखना सीख लिया,
उसे बदलना नहीं पड़ता—
दुनिया स्वयं
उसे बदलने लगती है।

जीवन वहीं से शुरू होता है
जहाँ विचार समाप्त होते हैं—
या जहाँ
तुम उनके ऊपर उठकर
उन्हें आते-जाते
चुपचाप देखते हो।

जो भी यह जान लेता है—
वह विचारों के संसार में
कैदी नहीं रहता,
वह अपनी आत्मा के
निर्मल आकाश में
एक स्वतंत्र पंछी की तरह
उड़ने लगता है।

वह जान लेता है—
जीवन विचारों के भीतर नहीं,
विचारों के पार है;
और पार जाने का मार्ग है
देखना—
बस
देखना—
पूरी शांति के साथ।

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