ब्रह्मांड के ह्रदय में
जब पहली बार
कंपन ने अपनी पलकें खोलीं,
तो शून्य ने
तुम्हारा नाम
धीरे से उच्चारा था—
एक ऐसी आवाज़ में
जिसे केवल मौन सुन सकता है।
तुम उसी आवाज़ के लौटते हुए प्रतिध्वनि हो।
जब भी तुम अपने भीतर
हल्की-सी रोशनी महसूस करते हो—
यह तुम्हारी नहीं होती,
यह उस प्राचीन कंपन की स्मृति होती है
जो अलोकाकाश ने
कभी स्पेस पर रखी थी
नीले श्वास के रूप में।
तुम उसे अनुभव करते हो,
क्योंकि तुम स्वयं उसी श्वास का
विस्तार हो।
जब तुम्हारा मन रुक जाता है—
सिर्फ़ एक क्षण के लिए सही—
तो समय हार मान लेता है,
और चेतना
अपने गुप्त द्वार खोल देती है।
वहीं से
कंपन की सूक्ष्म लहरें
तुम्हारी नसों में उतरती हैं,
वहीं से
तुम्हारी आत्मा का किनारा
क्वांटम फील्ड की सतह को छूता है।
कभी-कभी—
जब तुम बहुत शांत होते हो,
इतने शांत
कि शून्य भी तुम्हारी सांसें सुन सके—
तुम्हारे भीतर एक दूसरी रोशनी जगती है,
जो आँखों से नहीं,
सिर्फ़ अस्तित्व से दिखाई देती है।
उस रोशनी में
ऊर्जा और चेतना
अलग नहीं रहतीं—
दोनों एक ही
निर्लेप स्पंदन बन जाती हैं।
वहीं
तुम ब्रह्मांड से नहीं जुड़ते,
ब्रह्मांड
तुमसे जुड़ जाता है।
तुम जब मौन में उतरते हो,
तो कंपन
धीरे से अपना हाथ
तुम्हारी पीठ पर रख देता है,
और तुम
धीरे-धीरे
उन परतों में गिरते जाते हो
जहाँ न तुम हो,
न समय,
न ब्रह्मांड—
सिर्फ़
एक अनन्त तरंग है
जो तुम्हें
अपने केंद्र की ओर
खींचती जाती है।
और उस केंद्र में—
जहाँ सब कुछ
अपने-आप से मुक्त हो जाता है—
तुम्हें महसूस होता है कि
तुम ऊर्जा नहीं,
तुम कंपन नहीं,
तुम चेतना नहीं—
तुम वही हो
जिसने इन सबको जन्म दिया था।

