Observer Effect
(अवलोकन का प्रभाव — एक अस्तित्व-कविता)

जब सब कुछ आब्ज़र्व किया जा रहा हो,
तो जीवन तरंग नहीं रहता,
कण बन जाता है —
एक निश्चित बिंदु पर ठहरा हुआ,
जहाँ उसकी स्वतंत्रता
माप के अधीन हो चुकी है।

पहाड़ी नदी का अल्हड़पन
दरअसल एक wave function था,
संभावनाओं से भरा —
कभी यहाँ, कभी वहाँ,
कभी स्वयं से भी परे।

पर जैसे ही किसी ने देखा,
किसी ने नोट किया,
किसी ने कहा — “यह ऐसा है,”
नदी की संभावनाएँ
एक ही धारा में सिमट गईं।

अब वह बस बहती है
जैसे समीकरणों में बहता पानी —
जहाँ गति ज्ञात है, पर दिशा तयशुदा।
जहाँ बहाव नहीं, परिणाम है।

हर अवलोकन के साथ
जीवन अपनी क्वांटम अनिश्चितता खोता जाता है,
और जो बचता है —
वह बस एक निश्चित, नियंत्रित
“वास्तविकता” है।

कण के भीतर की तरंग
अब मौन है,
जैसे आत्मा अपनी संभावना भूल चुकी हो।

कभी-कभी मैं सोचता हूँ —
क्या हमें कोई न देखे
तो हम फिर से wave बन जाएँगे?
फिर से बिखरेंगे,
फिर से बहेंगे,
बिना मापे, बिना तय हुए —
जीवन की अपनी अनिश्चितता में।

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