एक सच्चा शब्द —
बोला नहीं जाता,
उपजता है।
वह मौन की गहराई में
जैसे बीज धरती को भेदता है,
वैसे ही सत्य को जन्म देता है।
वह वाक्य नहीं बनता,
वह कर्म बनता है।
वह हवा को नहीं,
वह आत्मा को हिलाता है।
जिस क्षण वह शब्द
मुँह से नहीं,
हृदय से निकलता है —
ब्रह्मांड का संतुलन
थोड़ा-सा बदल जाता है।
क्योंकि एक सच्चा शब्द
कंपन नहीं,
कंपन का शुद्धतम रूप है —
जो पदार्थ को दिशा देता है,
समय को अर्थ देता है।
देवताओं ने जिन मंत्रों से सृष्टि रची,
वह शब्द ही थे —
पर वे बोले नहीं गए,
वे आचरण बने।
“सत्य” तभी बोला जा सकता है
जब वह जीया जाए।
अन्यथा वह मात्र ध्वनि है,
जो दीवार से टकराकर लौट आती है।
हमारे हर असत्य से
ब्रह्मांड में एक दरार बनती है,
हर झूठ एक सूक्ष्म असंतुलन है,
जो किसी न किसी आत्मा में कंपन बन जाता है।
पर जब कोई मनुष्य
एक सच्चा शब्द बोलता है —
बिना स्वार्थ, बिना भय,
तो आकाश एक क्षण को
शांत हो जाता है।
वह शब्द फिर फैलता है —
हवा, जल, मन और मनुष्य में,
वह व्यवहारों, विचारों और सभ्यताओं में
धीरे-धीरे उतरता है।
और तब,
दुनिया बदलती है —
घोषणा से नहीं,
बल्कि उसके आचरण से।
क्योंकि एक सच्चा शब्द
कभी मरता नहीं,
वह रूप बदलता है।
वह विचार बनता है,
विचार कर्म बनता है,
और कर्म —
भविष्य का नया नाम।

