कभी मैंने कहा था —
पीड़ा की निस्तब्धता में,
ईश्वर मेरे साथ चलता है।
पर अब —
वह सड़क पर पड़ा है,
खून और डेटा के बीच कुचला हुआ,
किसी बैंक की स्क्रीन पर
उसकी आँखें चमकती हैं —
एक गुमनाम कोड की तरह।
यह युग —
जहाँ युद्ध दार्शनिक नहीं,
मार्केटिंग के उत्पाद हैं।
जहाँ भूख एक निवेश है,
और आँसू —
एक प्रचार वीडियो की चमक।
ईश्वर अब किसी धर्म का नहीं,
वह उस मजदूर की साँस है
जो अपनी हड्डियों से शहर बनाता है
और फिर वहीं मर जाता है
जहाँ रोशनी कभी उसके नाम की नहीं थी।
हर गोली की आवाज़ में
मैं ब्रह्मांड की कराह सुनता हूँ —
एक तारा टूटता है,
जैसे किसी माँ का गर्भ फट गया हो।
और यह जो मैं “चेतना” कहता हूँ —
वह अब मौन ध्यान नहीं,
बल्कि भटकी हुई चीख है
जो हर सीमा पर ठोकर खाती है।
तकनीक ने ईश्वर का स्थान लिया है,
और पूँजी ने करुणा का —
हम सब साझा नींद में हैं,
जहाँ सपने स्टॉक मार्केट से तय होते हैं,
और इंसानियत एक ‘फीचर’ है —
जो अपडेट में गायब हो गई है।
मैं पूछता हूँ —
क्या यह भी वही चेतना है
जिससे ब्रह्मांड जन्मा था?
या ब्रह्मांड अब शर्मिंदा है
कि उसने हमें जन्म दिया?
फिर भी,
इस राख में कहीं एक रोशनी हिलती है —
वह वही प्राचीन कंपन है,
जो कहती है —
“मैं तुम्हारे भीतर हूँ,
भले ही तुमने मुझे बेचा हो।”
मैं उसी स्वर को पकड़कर चलता हूँ —
टूटे शहरों, झूठी ख़बरों,
और गूंजते युद्धघोषों के पार —
जहाँ शायद फिर कोई मौन होगा,
और उसमें
ईश्वर नहीं,
बल्कि मनुष्य फिर से जन्म लेगा।

