दुनिया जैसी है, वैसी कोई नहीं जानता,
हर आँख में है एक अपना अंधकार,
हर दृष्टि में है एक प्रतिबिंब,
जो स्वयं को ही देखता है, संसार नहीं।
हम सब पहरेदार हैं अपने भ्रमों के,
सत्य के द्वार पर बैठे हैं
किन्तु चाबी हमारी भाषा की जेब में खो गई है।
ज्ञान — एक धूलभरी मेज़ है,
जिस पर अनुभव की उंगलियाँ
कुछ निशान छोड़ जाती हैं,
पर सत्य का चेहरा कभी साफ़ नहीं होता।
जो जानता है,
वह जानने के गर्व में अंधा है।
जो नहीं जानता,
वह शून्य के संगीत में कुछ सुन लेता है —
एक निस्तब्ध अनुगूंज,
जिसे केवल मौन ही समझ सकता है।
शून्य — कोई रिक्ति नहीं,
वह स्वयं प्रश्न का गर्भ है,
जहाँ से हर उत्तर
अपूर्णता के रूप में जन्म लेता है।
मीमांसा कहती है —
“तुम जो देखते हो,
वह देखने वाले का ही विस्तार है।”
तो क्या मैं ही यह ब्रह्मांड हूँ?
या ब्रह्मांड मेरा प्रतिबिंब?
ज्ञान और अज्ञान —
दोनों एक ही तरंग के दो छोर हैं।
जब तरंग थम जाती है,
सत्य वहाँ खड़ा होता है —
निर्विकार, निर्वाच, निराकार।
कितनी बार हमने सोचा —
“मैं जान गया हूँ।”
और कितनी बार पाया —
कि जानने के बाद भी
कुछ छूट गया —
कुछ जो न प्रकाश है, न अंधकार।
शायद वही “कुछ नहीं”
सबसे बड़ा कुछ है।
शून्य —
जहाँ न विचार हैं, न अनुभूति,
फिर भी वहीं से सब उत्पन्न होता है।
ज्ञान मीमांसीय शून्यवाद —
यानी, यह स्वीकारना
कि जानना स्वयं में एक भूल है,
और भूल ही सबसे गहरा बोध।
जो मिटा दे स्वयं को,
वही सत्य को छूता है।
जो खो दे सब अर्थ,
वही अर्थ के परे पहुँचता है।
मैं अब नहीं जानना चाहता,
मैं बस होना चाहता हूँ —
उस निस्तब्ध शून्य में,
जहाँ न “मैं” है, न “तुम”,
सिर्फ एक अवर्णनीय उपस्थिति —
जो सब है, और कुछ भी नहीं।

