बिग बैंग से पहले,
एक बिंदु था —
निशब्द, निष्कंप,
जहाँ न प्रकाश था, न छाया,
न समय था, न स्मृति,
सिर्फ एक सघन सिद्धांत था —
जो स्वयं से बँधा हुआ था।
वह बिंदु था जैसे
किसी विचार की अंतिम सांस,
जिसने सब कुछ समेट लिया था —
आवाज़ों के पहले की निस्तब्धता में,
संभावनाओं के गर्भ में।
फिर एक कंपन हुआ —
एक श्वास ने नियमों को तोड़ा,
एक आकांक्षा ने सीमाओं को चीर दिया,
और सिद्धांत फूट पड़ा व्यवहार में —
ब्रह्मांड बन गया।
वह विस्फोट नहीं था,
वह मुक्ति थी —
बंधन से, सूत्रों से,
परिभाषाओं और प्रमेयों से।
वह उस क्षण की उद्घोषणा थी —
“अब मैं जीऊँगा।”
न्यूटन के नियम वहीं छूट गए,
जहाँ गति का बीज अंकुरित हुआ,
आइंस्टीन के समीकरण
अभी जागने बाकी थे,
स्पेस-टाइम तब शिशु था —
जो अपनी पहली करवट में
अनंत को जन्म दे रहा था।
ब्रह्मांड ने सिद्धांत को नहीं जिया,
उसने स्वयं को अनुभव किया।
गति में, विस्फोट में,
शून्य की देह में फैलती हुई ऊर्जा में।
वह सीख रहा था —
कि नियम केवल एक माप हैं,
जीवन स्वयं माप से बाहर है।
कि गणित जहाँ समाप्त होता है,
वहाँ से व्यवहार प्रारंभ होता है।
सिद्धांत सोचता है —
व्यवहार महसूस करता है।
सिद्धांत रचता है सीमा,
व्यवहार खोजता है दिशा।
सिद्धांत कहता है “ऐसा होना चाहिए”,
व्यवहार कहता है “मैं ऐसे हुआ।”
वह बिंदु जो कैद था,
अब नृत्य कर रहा था —
तारों के बीच, नीहारिकाओं के संग,
और उस नृत्य में था
मुक्ति का संगीत।
हर धड़कते ग्रह में,
हर जलते सूरज में,
हर जीवन की साँस में
वही उद्घोष है —
कि “मैं सिद्धांत नहीं, व्यवहार हूँ।”
ब्रह्मांड अभी भी फैल रहा है,
क्योंकि मुक्ति अधूरी है।
हर नई आकाशगंगा,
हर नई चेतना,
हर नई समझ —
वही बिग बैंग दोहराती है —
“मुक्ति एक अनंत प्रक्रिया है।”
सिद्धांत फिर से बाँधने की कोशिश करता है,
हम समीकरण लिखते हैं,
समय को नापते हैं,
गति को बाँधते हैं —
पर ब्रह्मांड हँसता है
और कहता है —
“मुझे सिद्धांत मत बनाओ,
मुझे जीओ।”
क्योंकि जहाँ नियम समाप्त होते हैं,
वहाँ अनुभव प्रारंभ होता है।
जहाँ सूत्र थक जाते हैं,
वहाँ सृजन नाचता है।
और वही नृत्य —
ब्रह्मांड है।

