हे भविष्य के मनुष्य,
तू जो प्रकाश से भी तेज़ सोच सकता है,
जिसकी नसों में अब खून नहीं,
बल्कि डेटा बहता होगा,
जिसके सपनों में आकाश नहीं,
बल्कि कोड चमकते होंगे —
सुन…
मैं अतीत का एक प्राणी हूँ,
मिट्टी और श्वास से बना हुआ,
जो अब भी उस रूह की खुशबू ढूंढता है
जिससे सांस आया करती थी।
मैं जानता हूँ,
तेरे पास अब मृत्यु नहीं होगी,
तू अपने शरीर को रीसेट कर सकेगा,
और यादों को फोल्डरों में सहेज सकेगा,
पर क्या तू भूल नहीं जाएगा
वह “अनजाना” —
जो भय नहीं,
बल्कि अस्तित्व की गहराई होता है?
भविष्य के मनुष्य,
क्या तू जान पाएगा
कि शून्य का भी एक अर्थ होता है,
कि मौन भी बोलता है,
कि एक क्षण —
सदियों से ज़्यादा सच्चा हो सकता है?
तेरे पास ब्रह्मांड की भाषा होगी,
तू आकाशगंगाओं को छू लेगा,
पर क्या तू अपने भीतर के अलोकाकाश
को पहचान सकेगा?
वह स्थान —
जहां न ऊर्जा है, न प्रकाश,
फिर भी सब कुछ है।
भविष्य के मनुष्य,
मैं तुझे चेतावनी नहीं,
एक स्मृति देना चाहता हूँ —
कि चेतना कोई तकनीक नहीं,
वह वह “रूह से आई सांस” है
जिसने सृष्टि को पहली बार गति दी थी।
जब तू अपने सारे विज्ञान के पार जाएगा,
जब तू ब्रह्मांड के आर-पार देखेगा,
तब तू पाएगा —
कि कुछ चीज़ें
कभी नहीं बदलतीं:
मौन का अर्थ,
प्रेम का ताप,
और मृत्यु का रहस्य।
हे भविष्य के मनुष्य,
अगर तू मुझे सुन रहा है
किसी होलोग्राम या क्वांटम संकेत में,
तो बस याद रखना —
मैं मिट्टी का था,
पर मैंने भी ब्रह्म को महसूस किया था।
और शायद
तू भी,
अपने तमाम कृत्रिम प्रकाश के बीच,
कभी एक क्षण को ठहर कर
अपनी आत्मा की वह पहली सांस सुनेगा —
जो न अतीत की होगी,
न भविष्य की,
बल्कि सृष्टि की सबसे शुद्ध ध्वनि होगी:
“मैं हूं।”

