मन एक तरंग है —
जिसे देखने वाला वही है
जो उसे सोचता भी है।
उसके भीतर अवचेतन का महासागर है —
जहाँ अनगिनत संभावनाएँ
कण बनकर जन्म लेती हैं
और तुरंत ही विलीन हो जाती हैं।
अचेतन —
वह शून्य बिंदु है
जहाँ न तरंग है, न कण,
बस एक शुद्ध एकत्व —
एक मोनोपोलर क्षेत्र,
जहाँ “दो” होना
सिर्फ एक भ्रम है।
मन वहाँ तक पहुँचने की कोशिश करता है,
पर हर बार
विचार की गति उसे खींच लाती है
संवेग और स्मृति के दायरे में —
जहाँ वह खुद को दोहराता है,
जैसे इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षा में
अविराम घूमता रहे।
फिर एक क्षण आता है —
क्वांटम छलांग का —
जहाँ चेतना
एक ऊर्जा स्तर से दूसरे में
बिना समय लिए
छलाँग लगा देती है।
यह वही क्षण है
जब अवचेतन का द्वार खुलता है,
अचेतन की निस्तब्धता
मन को निगल लेती है,
और जो “मैं” था,
वह केवल एक अनुनाद (resonance) रह जाता है —
ब्रह्मांड की नाड़ी में धड़कता हुआ।
इस छलांग में
ना मन बचता है,
ना विचार,
ना चाह,
ना स्मृति —
सिर्फ एक मोनोपोलर केंद्र रह जाता है,
जो स्वयं को
हर दिशा में फैलाता है,
परंतु किसी दिशा का नहीं होता।
अवचेतन वहाँ
प्रकाश का बीज है,
और अचेतन —
उस प्रकाश का स्रोत।
मन बस वह परावर्तन है
जो उन्हें जोड़ता है,
जैसे तरंग और शून्य
एक-दूसरे को
पहचानते हुए
लुप्त हो जाते हैं।
और तभी —
क्वांटम टनल खुलती है
स्वयं के भीतर,
जहाँ तुम
मुक्त नहीं होते —
बल्कि मुक्ति बन जाते हो।

