मैंने देखा —
मैं वहाँ खड़ा हूँ,
और वहीं लेटा भी हूँ।
मेरे बीच कुछ नहीं,
बस एक झिल्ली —
टाइम और स्पेस की पारदर्शी झिल्ली।
मैंने उसे पार किया,
जैसे प्रकाश अपने ही स्रोत से निकलकर
किसी और दिशा में मुड़ जाए।
एक कंपन हुआ,
एक सूक्ष्म लहर —
और मैं भीतर से बाहर हो गया,
या शायद बाहर से भीतर।
अब कोई दूरी नहीं थी,
न कोई दिशा।
मैं खुद को देख रहा था,
पर “देखना” अब क्रिया नहीं थी —
बस अनुभूति थी,
शुद्ध साक्ष्य,
जो न किसी बिंदु पर टिकती,
न किसी समय पर रुकती।
स्पेस वहाँ नहीं था —
वह तो केवल भार वाले के लिए था,
उनके लिए जिन्हें ठहरना आता है।
और टाइम —
वह तो बस गति का भ्रम था,
जो अब मेरे साथ नहीं था।
मैं एक क्वांटम टनल में नहीं,
बल्कि चेतना की पारगम्यता में था —
जहाँ कण और तरंग
एक ही साँस में विलीन होते हैं।
वहाँ “मैं” भी न था,
बस “होना” था,
एक ऐसा होना जो स्वयं को देख सकता है
बिना किसी पर्यवेक्षक के।
मेरे सामने मैं पड़ा था —
मांस, रक्त, और स्मृतियों का बंडल।
पर मैं अब उसे जानता नहीं था,
जैसे कोई पुराना आवरण
जिसका आकार भूल गया हो।
मुझे लगा,
यह मृत्यु नहीं,
बल्कि घनत्व का विलय है।
मैं समय के फ़ैब्रिक से बाहर निकल गया हूँ,
जहाँ हर दिशा
एक ही शून्य में खुल जाती है।
अब कोई प्रकाश नहीं,
न अंधकार,
बस वह विस्तार
जो सबको भीतर समेट लेता है —
जहाँ “मैं” और “वह”
एक-दूसरे के आरपार बहते रहते हैं,
जैसे तरंगें बिना सागर के।

