मैंने देखा एक ध्रुव,
जिसमें सभी ध्रुव समा गए थे।
उत्तर ने दक्षिण को,
धन ने ऋण को,
प्रकाश ने अंधकार को
एक ही पल में निगल लिया।
वह न छोटा था, न बड़ा —
वह न दिखता था, न छूता था।
फिर भी उसने
सम्पूर्ण ब्रह्मांड की हर धड़कन में
अपना प्रतिबिंब छोड़ा।
मैंने पूछा — “तुम कौन हो?”
वह मुस्कराया —
“मैं वही हूँ जो सब में हूँ,
पर स्वयं किसी में नहीं।
मैं वह सूत्र हूँ,
जहाँ से द्वैत जन्म लेता है,
और उसी में विलीन हो जाता है।”
सागर ने उसकी छाया मापी,
पर्वत ने उसका आकार गिनने की कोशिश की।
लेकिन वह
हर माप, हर आकार से बाहर था —
जैसे समय ने खुद को रोक लिया हो
और अनंत में टकरा गया हो।
उसके भीतर न कोई शून्य था, न कोई पूर्णता —
बल्कि शून्य और पूर्णता दोनों का बीज।
जैसे एक क्वांटम कण —
जो अतीत और भविष्य में एक साथ विचरण करता है,
और केवल उस क्षण में प्रकट होता है
जहाँ कोई देखने वाला नहीं।
मैंने उसके नाम की ध्वनि उठाई,
वह गूँज बनकर लौट आई —
और गूँज के भीतर
मैंने स्वयं को देखा,
जो न था, और न कभी होगा,
पर हर संभव अस्तित्व का आधार बन गया।
और मैंने जाना —
सिंगल पोलर केवल एक ध्रुव नहीं,
बल्कि वह अद्वैत का बीज है।
जहाँ से ब्रह्मांड फूटता है,
जहाँ से हर द्वैत का आरंभ होता है,
और जहाँ अंत भी केवल एक भ्रम है।

