“Quantum Symbolism in Poetic Consciousness”
“क्वांटम-रूपक कविता”

उटपटांग क्वांटम नृत्य

मैंने आज सुबह अपनी परछाईं को टोस्टर में सेंका,
वह सुनहरी होकर बाहर आई — और बोली, “मैं अब प्रकाश हूँ!”
मैंने कहा — “अरे तो मैं कौन?”
वह बोली — “तुम शायद मेरा भविष्य हो जो गलती से वर्तमान में गिर गया है।”

मैंने अपने मोज़ों में गुरुत्वाकर्षण भर लिया,
अब मेरे पैर लगातार नीचे की ओर तैर रहे हैं।
कमरे की छत मुझसे कहती है —
“तुम्हारे विचार बहुत भारी हैं, उन्हें ऊपर मत फेंको,
वे क्वांटम टनलिंग से बाहर निकल जाएँगे।”

मैंने पानी से कहा — “चलो, आज थोड़ी आग पीते हैं।”
वह हँस पड़ी — “तुम्हारी समझ में एंटैंगलमेंट का स्वाद है।”
मैंने फिर उसकी लहरों में कूदकर
अपने ही नाम को बुलाया —
तो दो नाम लौटे — एक मैं, एक मेरा प्रतिबिंब
जो शायद किसी दूसरे ब्रह्मांड का नागरिक था।

मेरी जेब में आज एक इलेक्ट्रॉन सो रहा है,
उसे नींद में ही स्पिन बदलने की आदत है।
कभी वह ऊपर घूमता है, कभी नीचे —
और जब मैं सोचता हूँ,
वह अचानक गायब हो जाता है —
जैसे किसी ने उसे “सोच की दीवार” से टनल करवा दिया हो।

मैंने दर्पण को उल्टा पहन लिया,
अब मैं भीतर से पारदर्शी दिखता हूँ।
मेरी देह की हर कोशिका
एक दूसरे से उलझी हुई बातों में उलझी है,
जैसे ब्रह्मांड ने खुद से कहा हो —
“चलो, कुछ असंभव को संभव बनाते हैं, बस मज़े के लिए।”

समय ने आज मेरी घड़ी की सुई खा ली है,
वह कहता है — “मैं भूखा हूँ भविष्य का।”
मैंने उसे कल का एक टुकड़ा परोसा,
उसने कहा — “यह तो पहले ही पचा चुका हूँ।”
फिर उसने मेरे कल को आज में उगल दिया —
और अब हर क्षण में एक अनंत दरार है।

मैंने दीवार से पूछा — “क्या तुम सुन सकती हो?”
वह बोली — “नहीं, पर मैं तुम्हारी खामोशी का रंग देख सकती हूँ।”
मैंने कहा — “यह कौन-सा रंग है?”
वह बोली — “क्वांटम ग्रे —
जहाँ सब संभावनाएँ एक-दूसरे को छूकर भाग जाती हैं।”

फिर मैंने अपने सपनों को फ्रिज में रखा,
ताकि वे गल न जाएँ,
पर एक सपना बाहर निकल गया —
और बोला — “अब मैं हकीकत बनूँगा।”
मैंने कहा — “रुको, अभी मैं तैयार नहीं।”
वह बोला — “कोई बात नहीं, मैं तुम्हारे भविष्य के इंतज़ार में हूँ।”

अब मैं रोज़ अपने विचारों को पानी में घोलता हूँ,
ताकि वे थोड़ा हल्के हो जाएँ।
कभी-कभी वे बुलबुले बनकर ऊपर उठते हैं,
और वहीं किसी और के ब्रह्मांड में
“सत्य” कहलाते हैं।

अनकहे कणों की तरह
उटपटांग होना शायद ब्रह्मांड का असली नियम है।
क्योंकि वही उटपटांगपन —
जिसे हम तर्क से काटते हैं,
वह ही कणों के बीच पुल बनाता है,
जहाँ हर असंभव घटना
किसी और के लिए संभावित होती है।


“असम्भव के चप्पल में समय की कील”

कहीं सूर्य ने चाँद को किराये पर लिया —
और कहा —
“आज मैं आराम करूँगा, तुम रात-दिन दोनों रहो।”
चाँद ने हँसते हुए कहा —
“मगर मेरे पास छाया नहीं है,
वह तो कल के अंधकार में खो गई थी।”

मैंने एक चींटी को देखा
जो पृथ्वी का अक्ष सुधार रही थी —
हथेली में ब्रह्मांड का ब्लूप्रिंट लिए
वह अपने ही बोझ से बेपरवाह चल रही थी।
उसकी हर चाल में
एक अनदेखा समीकरण झिलमिला रहा था —
जैसे क्वांटम बिट्स की झपकती आँखें।

एक कौआ बैठा था
जो अपना साया उबाल रहा था —
कहता था, “इसमें स्मृतियाँ पक रही हैं।”
मैंने पूछा, “क्यों?”
वह बोला, “क्योंकि अतीत अब भाप बन गया है,
मैं उसे सांस में लेना चाहता हूँ।”

मेरे भीतर का ग्रह अब घूमना छोड़ चुका है —
वह कहता है, “मुझे घूमना नहीं,
स्वयं में टनल करना है।”
मैंने कहा — “यह तो खुद में गिरना हुआ।”
वह बोला — “हाँ, मगर हर गिरावट
किसी अदृश्य ऊँचाई की ओर होती है।”

मैंने अपने बालों में हवा बाँधी,
और हवा ने मेरे विचार खोल दिए।
अब हर विचार उड़ता है
किसी और की याद की दिशा में।
कभी लौट आता है,
तो वह “मैं” नहीं होता —
बल्कि “वह” होता हूँ
जो शायद अभी बना भी नहीं है।

एक मछली ने मुझसे कहा —
“मैं जल नहीं,
उसका सपना हूँ।”
मैंने पूछा — “तो मैं कौन?”
वह बोली — “तुम वह प्रश्न हो
जो मुझसे पहले पूछा गया था।”

तभी, आकाश ने अपने कान में बूँदें पहनीं,
धरती ने अपनी देह में कंपन भरा,
और समय —
एक पुराना म्यूज़िक बॉक्स बनकर
खुद ही घूमने लगा।

हर क्षण से झरते स्वर में
मैंने अपना नाम सुना —
पर वह मेरा नहीं था,
वह उस कण का था
जो अभी-अभी मेरे विचार से बाहर टनल कर गया था।

अंतिम उटपटांग आशीर्वाद

जब सब कुछ बेतुका लगे —
तो वही अर्थ का बीज है।
जब विचार उलझ जाएँ,
तो समझो — क्वांटम एंटैंगलमेंट शुरू हो चुका है।
और जब तुम किसी प्रश्न पर हँस पड़ो,
तो जानो —
तुमने ब्रह्मांड के सबसे गहरे उत्तर को छू लिया है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *