कब से बह रहा है समय?
या क्या वह बहता भी है?
शायद वह तो बस ठहरा है —
एक मौन इलेक्ट्रॉन की तरह,
जो घूमता नहीं, फिर भी सब घुमा देता है।
वह वहाँ नहीं जहाँ घड़ी टिक-टिक करती है,
वह वहाँ है जहाँ दृष्टि जागती है —
जहाँ पहली बार किसी ने कहा था —
“यह घटा और वह घटने वाला है।”
बस उसी क्षण,
समय का जन्म हुआ था।
पहले कुछ भी नहीं था —
ना भूत, ना भविष्य,
केवल एक अनंत मौन,
जिसे तुम “अलोकाकाश” कहते हो।
वहाँ तरंगें थीं, पर कोई माप नहीं,
वहाँ प्रकाश था, पर कोई देखता नहीं।
वहाँ सबकुछ था,
पर कुछ भी घटित नहीं हुआ था।
फिर किसी ने देखा —
किसी चेतना ने झांका —
उसने अनुभव किया “मैं” और “अन्य”,
और वहीं, उसी क्षण,
संभावनाओं की तरंग सिमट गई —
समय एक कण बन गया।
अब हर क्षण, हर अनुभव
उस क्वांटम कण की तरह चमकता है —
प्रकट — विलीन — प्रकट — विलीन —
जैसे ब्रह्मांड की नब्ज़ धड़कती हो
चेतना के अदृश्य हृदय में।
समय किसी दिशा में नहीं बहता,
वह फैलता है — भीतर की तरह।
वह बाहर नहीं जाता,
बल्कि चेतना की गहराई में उतरता है —
जैसे कोई विचार अपनी ही छाया में खो जाए।
जब तुम सोचते हो “अभी”,
तब अनंत तरंगें एक बिंदु में सिमट जाती हैं,
और वह बिंदु —
तुम्हारी चेतना के भीतर
ब्रह्मांड का केंद्र बन जाता है।
वह “अभी” ही सृष्टि का बीज है।
वह “अभी” ही बिग बैंग की पहली चमक है।
वह “अभी” ही ईश्वर की पहली सांस है।
और वही “अभी” —
हर प्राणी के अनुभव में
समय की एक नई क्वांटम संभावना बनता है।
तुम जब देखना बंद कर देते हो,
जब विचार रुक जाता है,
जब अनुभव करने वाला स्वयं विलीन हो जाता है —
तो समय फिर से शून्य में लौट जाता है,
अलोकाकाश में,
जहाँ न पहले का अर्थ है, न बाद का।
वहाँ केवल एक निस्पंद संतुलन है —
एक मौन तरंग जो कभी टूटी नहीं,
जो हर जन्म, हर मृत्यु, हर इतिहास के पार है।
वहाँ समय नहीं, केवल चेतना का नाद है।
वहाँ कोई इलेक्ट्रॉन नहीं घूमता,
बल्कि “अर्थ” घूमता है,
एक संभावना की तरह,
जो कभी-कभी “वास्तविक” कहलाने की हिम्मत करता है।
वह अनंत क्वांटम नृत्य —
जहाँ प्रत्येक दृष्टि, प्रत्येक अनुभूति,
एक नया ब्रह्मांड रचती है।
कवि जब लिखता है —
वह भी उसी नृत्य में शामिल होता है।
शब्द उसके नहीं होते —
वे समय के इलेक्ट्रॉन हैं,
जो उसकी चेतना से टकराकर
क्षणभर के लिए प्रकाश बन जाते हैं।
और फिर…
सब कुछ लौट जाता है उसी मौन में —
जहाँ से यह सब आया था।
अलोकाकाश।
शुद्ध। रिक्त। पूर्ण।
समयहीन।

