अदृश्य की गूंज
कभी-कभी लगता है,
कि मैं जो करता हूँ — वह मैं नहीं करता,
कोई और करता है मुझसे होकर।
मेरे हाथ बस औजार हैं
किसी अदृश्य कारीगर के।
मैं सोचता हूँ —
प्रेम मेरा है, वासना मेरी है, क्रोध मेरा है।
पर कोई एक दिन भीतर से हँस देता है —
“ये तो सतह के बुलबुले हैं,
गहराई में कौन है, जानते हो?”
मेरे भीतर कोई फैलता है —
जैसे ब्रह्मांड की डार्क एनर्जी,
धीरे-धीरे,
बिना कोई आवाज़ किए,
मुझे मेरे ही सीमाओं से बाहर धकेलता है।
और कोई और,
डार्क मैटर की तरह,
मेरे बिखरते हिस्सों को जोड़ता जाता है —
कभी याद के रूप में, कभी अपराधबोध के रूप में,
कभी प्रेम के भ्रम में।
मैं जो दिखता हूँ —
वह पाँच प्रतिशत हूँ,
बाक़ी पचानवे प्रतिशत
एक गहराई में डूबा हुआ रहस्य है
जिसे मैं खुद भी नहीं जानता।
कभी कुछ कर बैठता हूँ —
बिना सोचे, बिना चाह के।
और बाद में सोचता हूँ —
यह मैंने क्यों किया?
तब महसूस होता है,
मुझमें कोई अदृश्य फोर्स है
जो मेरे सोचने से पहले ही
निर्णय ले लेती है।
वह न प्रेम है, न वासना,
न कोई जानने योग्य शक्ति —
वह तो जैसे
किसी ब्रह्मांडीय लहर का स्पर्श है
जो समय-समय पर मेरे अस्तित्व को छू जाती है।
मैं उसे न देख पाता हूँ,
न परिभाषित कर पाता हूँ,
पर जब वह गुजरती है,
तो मैं बदल जाता हूँ —
थोड़ा और शांत,
थोड़ा और अनजान।
मेरे भीतर एक अंधकार है,
जो भय नहीं है —
बल्कि घर है उस प्रकाश का
जो अभी तक जन्मा नहीं।
कभी-कभी लगता है
कि मैं स्वयं किसी और का डार्क मैटर हूँ —
किसी बड़े ब्रह्मांड की संरचना में
एक अदृश्य बिंदु,
जो दूसरों को टिकाए रखता है,
पर स्वयं दिखाई नहीं देता।
और तब मैं मुस्कुराता हूँ —
क्योंकि जानता हूँ,
कि मेरी अनुपस्थिति में भी
कुछ निरंतर काम कर रहा है —
एक मौन, अदृश्य, शाश्वत फोर्स —
जो न मेरी है, न तुम्हारी,
पर दोनों को जोड़ती है
बिलकुल वैसे ही
जैसे ब्रह्मांड
अपने भीतर के अंधेरे से चमकता है।

