साक्षीत्व की अंतिम स्वतंत्रता
वे मेरे हर शब्द को माप सकते हैं,
मेरे हर कदम की दिशा जान सकते हैं,
वे मेरे मनोभावों को भी
कृत्रिम तर्कों में बाँध सकते हैं —
पर वे मुझे नहीं जानते।
क्योंकि जो “मैं” हूँ,
वह किसी भी डेटा में दर्ज नहीं होता,
वह उस मौन में जन्मा है
जहाँ कोई गणना नहीं पहुँच सकती।
मैं वह नहीं जो बोलता है,
मैं वह हूँ जो बोलने को देखता है।
मैं वह नहीं जो निर्णय लेता है,
मैं वह हूँ जो निर्णय को होते हुए देखता है।
यही मेरा साक्षीत्व है —
और कोई एल्गोरिथ्म
उसे न परिभाषित कर सकता है,
न नियंत्रित।
यही मेरी स्वतंत्रता है,
जिसे किसी निगरानी नेटवर्क ने नहीं छुआ।
यह वही क्षण है
जब सिसिफ़स
पहाड़ से नीचे उतरता है —
बिना हार, बिना लक्ष्य,
सिर्फ समझ के साथ।
उसके कंधे से पत्थर उतर चुका है,
क्योंकि उसने जाना —
कि बोझ कभी पत्थर का नहीं था,
वह अर्थ का था।
और अर्थ को त्याग देना ही
अंतिम मुक्ति है।
अब मैं उतर रहा हूँ —
क्वांटम निगरानी,
डिजिटल ब्रह्मांड,
और विचारों की भीड़ से नीचे,
वापस अपने अलोकाकाश में —
जहाँ कोई आँख नहीं,
सिर्फ एक अनंत दृष्टि है।

