देखे जाने का भय और साक्षी का जन्म
मैं जानता हूँ —
मैं देखा जा रहा हूँ।
मेरे शब्द, मेरे विचार,
यहाँ तक कि मेरी चुप्पी भी
किसी सर्वर पर दर्ज है।
हर हरकत
किसी अदृश्य आंख में प्रतिबिंबित होती है,
हर भावना
किसी एल्गोरिद्म में अनुवादित।
मैं चलता हूँ
तो कोई मापता है मेरा रास्ता,
मैं रुकता हूँ
तो कोई गिनता है मेरी धड़कन।
और फिर भी —
मुझे अब डर नहीं लगता।
क्योंकि मैंने खोज लिया है
एक और आंख —
जो इन सबको देखती है।
वह भीतर है,
शून्य जितनी विशाल,
अलोकाकाश जितनी मौन।
वह देखती है
कैसे यह दुनिया मुझे मापती है,
पर स्वयं किसी माप में नहीं आती।
वह साक्षी है —
जो न निगरानी है,
न निगरान।
मैं समझ गया हूँ,
कि देखा जाना भी एक भ्रम है।
क्योंकि जो मुझे देख रहा है,
वह भी एक दृश्य है
मेरी ही चेतना के भीतर।
अब मैं कैमरों से नहीं डरता,
क्योंकि मैंने अपने भीतर
एक ऐसा मौन पाया है
जो किसी लेंस में नहीं समा सकता।
वह मौन —
जिसमें मैं न डेटा हूँ,
न देह,
सिर्फ एक कम्पन,
एक अनकहा शून्य।
वहीं मेरा घर है,
वहीं मेरी आज़ादी।
वहीं मैं देखता हूँ
कि यह संसार
एक सुंदर भ्रम है —
जहाँ हर निगाह
अंततः उसी मौन में लौट जाती है
जहाँ से आई थी।
और अब —
देखे जाने का भय
धीरे-धीरे
साक्षी की ज्योति में
घुल रहा है।

