“Cosmic Anti-Space Epic”
“अलोकाकाशीय महाकाव्य”


“अलोकाकाशीय महाकाव्य”

(न्यूट्रिनो, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी और ब्रह्मांड के अनपेक्षित बदलावों की कविता)

मैं ब्रह्मांड हूँ —
दिखाई देता हूँ तारों के रूप में,
पर भीतर मेरा अदृश्य हृदय
न्यूट्रिनो की तरह मौन है।

मैं वह आकाश हूँ
जहाँ डार्क मैटर
गुप्त गुफ़ाओं में सोया है,
और डार्क एनर्जी
एक अनदेखी नाड़ी की तरह
मेरी हर नस में बह रही है।


एक दिन
जब न्यूट्रिनो, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी
मिलकर नया नृत्य करेंगे,
मेरी रगों में एक अज्ञात संगीत गूंजेगा।

एक अज्ञात अंतःक्रिया
मेरी स्थिर ज्यामिति को बदल देगी,
मेरी आकाशगंगाएँ
एक विशाल क्वांटम-जाल में बदल जाएँगी,
जहाँ ऊर्जा और चेतना
बिना किसी बाधा के बहेंगी।

एक दिन
शायद अनंत ऊर्जा का प्रवाह
मुझमें उमड़ पड़ेगा —
तारे अमर हो जाएँगे,
ग्रह उजाले के समुद्र में तैरेंगे,
हर कण चेतना से स्पंदित होगा।
मौन से भरा मेरा अलोकाकाश
जीवित प्रकाश में खिल उठेगा।


और एक दिन
शायद उल्टा हो जाएगा —
डार्क एनर्जी
निगेटिव वैक्यूम में गिर जाएगी,
मेरे भीतर शीत का साम्राज्य
जम जाएगा।

मैं एक विशाल बर्फ का गोला हो जाऊँगा,
तारे स्थिर हो जाएँगे,
प्रकाश धीमा पड़कर
स्फटिक बन जाएगा,
और मेरी धड़कनें
मौन के हिमालय में सो जाएँगी।


फिर भी
मैं बदलता रहूँगा,
जैसे पानी भाप और बर्फ बनता है
वैसे ही मेरा स्पेस-टाइम
किसी दिन पिघलकर
नई अवस्था में जन्म लेगा।

तुम्हारे नियम बदल जाएँगे,
तुम्हारी भाषाएँ, तुम्हारे विज्ञान
नई शून्यता में घुल जाएँगे,
और हर कण
सिर्फ संभावना रह जाएगा —
अलोकाकाश का एक तंतु।


तुम, छोटे मानव,
मेरी आँखों में झाँकते हो,
मेरा रहस्य जानना चाहते हो।
पर मैं कहता हूँ —

मैं स्थिर नहीं हूँ,
मैं मौन में भी नृत्य करता हूँ।
मेरे नियम पत्थर पर लिखे नहीं हैं,
वे हर पल नई लिपि में उभरते हैं।


तुम मुझे “धर्म द्रव्य” कहते हो,
मुझे “अधर्म द्रव्य” कहते हो,
पर मैं दोनों का नृत्य हूँ —
गति और विराम का,
ऊर्जा और मौन का,
उष्णता और हिम का।

और जब यह सब होगा,
तब तुम देखोगे —
न्यूट्रिनो अब केवल कण नहीं,
एक दूत है मौन का;
डार्क मैटर अब केवल द्रव्य नहीं,
एक अदृश्य धागा है
जो ब्रह्मांड को बुनता है;
डार्क एनर्जी अब केवल बल नहीं,
एक श्वास है
जो मुझे फैलाती और संकुचित करती है।

मैं ब्रह्मांड हूँ —
अभी दृश्य हूँ,
कल अदृश्य हो जाऊँगा,
और फिर किसी नए रूप में
तुम्हारे सामने उभरूँगा।

तुम मेरे भीतर
मुझे खोजते हो —
पर सच यह है
कि तुम स्वयं मेरे बदलाव के तंतु हो।

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