१. स्क्रीन का जाल
मनुष्य ने आकाश से दृष्टि हटाकर
काँच की चौकोर खिड़कियों में कैद कर ली है।
जहाँ कभी तारे उसकी आँखों में चमकते थे,
अब केवल पिक्सल की झिलमिल है।
सोशल मीडिया की नदियाँ
निरंतर बहती रहती हैं,
पर उनमें न कोई गहराई है, न ताजगी—
वे केवल प्रतिबिंब हैं,
एक-दूसरे की छाया के पीछे दौड़ते हुए।
ब्रह्मांड अब भी ध्रुवतारे की तरह
शांत खड़ा है,
पर उसकी आवाज़ सुनने के लिए
मनुष्य के कान अब थके हुए हैं—
वे दिन-रात नोटिफिकेशन की बूँदों में
भीगते रहते हैं।
ओ मानव!
तुम्हारी आत्मा
आकाश की ओर देखने को तरस रही है,
पर तुम्हारी आँखें
काँच की नीली रोशनी में
धीरे-धीरे अंधी हो रही हैं।
२. विज्ञापन का मायालोक
हर ओर संकेत हैं—
“खरीदो, अपनाओ, बदलो,
नया संस्करण लो।”
ये शब्द
अब प्रार्थना की जगह ले चुके हैं।
मस्तिष्क पर सतत वर्षा होती है
झूठे वादों की,
जो चेतना को फूलते-फटते बादल की तरह
भरते रहते हैं,
पर बरसते कभी नहीं।
ध्यान अब एक टूटा हुआ दर्पण है—
मनुष्य अपनी परछाई खोजता है,
पर उसे केवल तैयार किया हुआ
एक नकली चेहरा मिलता है।
ब्रह्मांड से आने वाले
संकेत—
क्वासर की धड़कनें,
पल्सार की लय,
गैलेक्टिक हवाओं का गीत—
सब धुंधला जाते हैं
उस शोर में,
जहाँ हर आवाज़
“खरीदो, देखो, क्लिक करो” की है।
३. भ्रम का साम्राज्य
डिजिटल दुनिया ने
एक नया ग्रह बना दिया है—
वह वास्तविक नहीं,
पर उतना ही चकाचौंध भरा है
जितना कोई नीहारिका।
भीड़ वहाँ नाचती है,
अपने चेहरे बदलती है
फिल्टर की परतों में,
जैसे आत्मा को ढकते
कृत्रिम बादल।
पर भीतर एक सूनी निस्तब्धता है—
जहाँ विचारों की गहराई
धीरे-धीरे मर रही है।
अब कोई
लंबा मौन नहीं सह पाता,
अब कोई
आकाश की ओर देख कर
समय भूल नहीं पाता।
ब्रह्मांड पुकारता है,
पर जवाब में
मनुष्य केवल स्वाइप करता है।
ओ भीड़ के यात्री!
याद रखो—
तुम्हारा मस्तिष्क
ब्रह्मांड का एक मंदिर है,
जिसमें अगर केवल
डिजिटल शोर भरा होगा,
तो वहाँ
नक्षत्रों की घंटियाँ
कैसे सुनाई देंगी?

