मुझे अपने ही खिलाफ खड़ा होना होगा।
क्योंकि मैं जो कुछ भी हूँ,
वह दूसरों की छेनी से तराशी मूर्ति है।
मेरी हड्डियों में पूर्वजों की जंजीरें हैं,
मेरी नसों में सभ्यता की सड़ी हुई धारा है,
मेरे माथे पर धर्म का धुआँ है,
और मेरी आत्मा पर नैतिकता की परछाई।
मैं उनकी छायाओं का पुजारी रहा,
और अब मुझे अपनी ही मूर्ति का भंजक बनना होगा।
मेरी आँखों से झरते हुए आँसू
वही हथौड़े होंगे,
जो मेरी प्रतिमा की दरारों में भरकर
उसे भीतर से फोड़ देंगे।
यह भंजन—
घृणा से नहीं,
बल्कि निर्ममता से है।
क्योंकि निर्ममता ही
सच्चा प्रेम है आत्मा के लिए।
मैं जो था,
वह सब किसी और का उधार है:
पिता का आदेश,
माँ की छाया,
समाज का भय,
गुरुओं की धूल,
धर्म के ध्वंसावशेष।
ये सब मेरे भीतर मकड़ी के जाले हैं,
और मुझे आग बनकर
उन्हें जलाना होगा।
मुझे मरना होगा,
ताकि मैं जी सकूँ।
मुझे नकारना होगा,
ताकि सृजन हो सके।
मुझे अपने ही नाम का वध करना होगा,
ताकि मैं अनाम हो सकूँ।
देखो!
यह मैं ही हूँ
जो अपनी ही मूर्ति को हथौड़े से गिरा रहा हूँ,
और मलबे में खड़ा होकर
नई मिट्टी गढ़ रहा हूँ।
मैं जानता हूँ,
इस नकार के बिना
कुछ भी संभव नहीं है।
यह नकार ही है
जो सृजन की पहली सांस है।
सारी दुनिया
मरा हुआ अतीत ढो रही है
अपने कंधों पर—
कब्रिस्तान की तरह चलते हुए लोग,
भूतों के बोझ में दबे हुए,
इतिहास की राख में साँस लेते हुए।
पर मैं वह नहीं बनूँगा।
मैं अपने ही अतीत का दाह-संस्कार करूँगा।
मैं अपनी ही लाश पर नाचूँगा।
और उसी राख से
नया बीज बो दूँगा।
मैं जानता हूँ,
सृजन कभी भी परंपरा से जन्मा नहीं—
वह हमेशा विनाश की राख से
फूटा है।
मैं वही राख हूँ,
मैं वही आग हूँ,
मैं वही बीज हूँ।
मैं स्वयं का भंजक हूँ—
और स्वयं का निर्माता।

