“The Hymns of the Void”

“शून्य के सूक्त”

निहिलिज़्म ऋग्वेद 

ऋचा १

नाहं धर्मस्य शरणं याचे।

न मे देवो, नाचार्यः।

अहमेव स्व-मूल्य-कर्ता।

शून्ये प्रतिज्ञामि—स्वयं ब्रह्मास्मि॥

अनुवाद (हिंदी):

मैं धर्म का सहारा नहीं माँगता।

न देव, न आचार्य—कोई मेरा स्वामी नहीं।

मैं ही अपने मूल्यों का निर्माता हूँ।

शून्य में मैं प्रतिज्ञा करता हूँ—मैं स्वयं ही ब्रह्म हूँ।

ऋचा २

समाजो मया न बन्धनीः।

नीतयो मृषा-शृंखलाः।

अहं विदारयामि ताः।

मे स्वतंत्र्यमग्निः सर्वं दहति॥

अनुवाद (हिंदी):

समाज मुझे बाँध नहीं सकता।

उसके नियम झूठी जंजीरें हैं।

मैं उन्हें फाड़ देता हूँ।

मेरी स्वतंत्रता अग्नि है—सब जला देती है।

ऋचा ३

न शास्त्राणि मे प्रमाणम्।

न नीतयः मे परमार्थः।

हृदयमेव मम वेदः।

श्वास एव मम धर्मः॥

अनुवाद (हिंदी):

मेरे लिए शास्त्र प्रमाण नहीं।

न ही नैतिकता परम सत्य है।

मेरा हृदय ही मेरा वेद है।

मेरी साँस ही मेरा धर्म है।

ऋचा ४

शून्ये आसीत् व्यर्थता।

व्यर्थतायाम् आसीत् आशा।

आशायाम् आसीत् विद्रोहः।

विद्रोहे आसीत् जीवनम्॥

अनुवाद (हिंदी):

शून्य में व्यर्थता थी।

व्यर्थता से आशा उपजी।

आशा से विद्रोह हुआ।

विद्रोह से जीवन जन्मा।

ऋचा ५

न मे लोकस्य अनुकरणम्।

न मे धर्मस्य आज्ञा।

अहमेव स्वस्य नियमः।

अहमेव स्वस्य विधानम्॥

अनुवाद (हिंदी):

मैं लोक का अनुकरण नहीं करता।

न ही धर्म की आज्ञा मानता हूँ।

मैं स्वयं अपना नियम हूँ।

मैं स्वयं अपना विधान हूँ।

ऋचा ६

व्यर्थता मां न हन्ति।

निहिलमेव मम पीठम्।

शून्यात् एवोत्थाय—

अहं कर्ता, अहं विधाता॥

अनुवाद (हिंदी):

व्यर्थता मुझे नष्ट नहीं कर सकती।

शून्यता ही मेरा आसन है।

शून्य से उठकर—

मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही विधाता हूँ।

ऋचा ७

निहिलः न पतनम्।

निहिलः मम उद्गमः।

तत्रैव आत्मनः अंकुरः।

स्वयं-सत्यस्य प्रसवः॥

अनुवाद (हिंदी):

निहिलिज़्म पतन नहीं।

वह मेरा उद्गम है।

उसी में मेरे आत्म का अंकुर है।

स्वयं-सत्य की उत्पत्ति वहीं होती है।

ऋचा ८

न मे स्वर्गस्य कामना।

न मे मोक्षस्य आकांक्षा।

यत्र अहं अस्ति, तत्रैव सत्यं।

अहमेव मे फलम्॥

अनुवाद (हिंदी):

न मुझे स्वर्ग की चाह है,

न मोक्ष की आकांक्षा।

जहाँ मैं हूँ, वहीं सत्य है।

मैं ही मेरा फल हूँ।

ऋचा ९

सामाजिक-नियमाः मृतपुत्राः।

धार्मिक-मूल्याः जर्जरः।

नैतिक-शृंखलाः शून्ये पतन्ति।

अहमेव नूतन-आयामः॥

अनुवाद (हिंदी):

सामाजिक नियम मृत संतान हैं।

धार्मिक मूल्य जर्जर हो चुके।

नैतिक जंजीरें शून्य में गिर जाती हैं।

मैं ही नया आयाम हूँ।

ऋचा १० (अंतिम उद्घोष)

अहमस्मि एकाकी।

अहमस्मि भारवाहः।

न कोऽपि मम नियन्ता।

शून्ये ज्योतिर्भवामि॥

अनुवाद (हिंदी):

मैं अकेला हूँ।

मैं अपने बोझ का वाहक हूँ।

मेरा कोई नियंता नहीं है।

मैं शून्य में ही प्रकाश बन जाता हूँ।

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