ब्रह्मांड का स्वप्न : महाकाव्य
प्रथम गीत : तरंगों का उद्गम
हे शून्य के गायक, मुझे स्वर दो,
कि मैं कह सकूँ उस महासागर की कथा,
जहाँ न समय था, न ध्वनि, न स्वरूप।
केवल तरंगें थीं—
जन्मती और मिटती,
अचेतन के गर्भ में स्वतः उठतीं।
किसने उन्हें जगाया?
किसने उन्हें थामा?
न कोई देवता, न कोई नायक।
स्वयं तरंगें ही देवता थीं,
स्वयं तरंगें ही नायक।
द्वितीय गीत : स्मृतियों की धुंध
देखो—धुंध उठती है,
गैसें, तारे, नीहारिकाएँ फैलती हैं।
ये हैं अतीत की हड्डियाँ,
भूली इच्छाओं की राख।
तारे पुकारते हैं:
“हम जलते हैं बिना कारण,
हम फूटते हैं बिना स्मरण।
हमारे पास कोई कथाकार नहीं—
फिर भी कथा बह रही है।”
यात्री चलता है उस स्मृति-नीहारिका में,
जहाँ हर चमकती धूल
उसके ही भूले हुए स्वप्न का टुकड़ा है।
तृतीय गीत : अंधकार का सिंहासन
और अब—
आता है वह विराट अंधकार,
जहाँ प्रकाश काँपकर बुझ जाता है।
हे ब्लैक होल, हे भय के अधिपति,
तू निगलता है नक्षत्रों को,
तू मोड़ देता है समय को।
पर तेरे पास कोई योजना नहीं।
तू केवल है,
जैसे सिसिफस की शिला—
गिरती है, उठती है, फिर गिरती है।
अंधकार कहता है:
“मैं शून्य हूँ,
पर शून्य होना ही मेरा अस्तित्व है।”
चतुर्थ गीत : आकर्षण का उदय
मगर अंधकार के पार
प्रकाश फूटता है,
गैलेक्सियाँ जन्मती हैं,
ग्रह अपने पथ गढ़ते हैं।
यह है प्रेम का विस्तार—
बिना प्रेमी के,
बिना वचन के।
गुरुत्व खींचता है
जैसे कोई अज्ञात आलिंगन,
जो हर कण को जोड़ता है,
पर स्वयं को नहीं जानता।
ययाति की तरह यात्री पुकारता है:
“क्या मैं इस प्रवाह को रोक सकता हूँ?”
समय हँसता है—
“मैं किसी का नहीं।
मैं केवल हूँ, और इसी में अनंत हूँ।”
पंचम गीत : शून्यता का दर्पण
अब सब थम गया।
लहरें बुझ गईं, तारे मौन हुए,
भय और प्रेम विलीन।
सामने है शून्य—
एक विशाल दर्पण,
जिसमें सब कुछ झलकता है
पर कोई छवि स्थिर नहीं।
दर्पण फुसफुसाता है:
“हे यात्री,
तू खोजता रहा स्वामी को,
नियंत्रक को,
पर न कोई था, न कोई है।
ब्रह्मांड अचेतन है,
स्वयं में बहता हुआ।
और तू—
उस अचेतन स्वप्न की एक चिंगारी।
तू जब मिटेगा,
स्वप्न चलता रहेगा।
क्योंकि स्वप्न देखने वाला कभी था ही नहीं।”
उपसंहार : महाकथा की प्रतिध्वनि
हे श्रोता,
यह है वह गाथा जो न लिखी गई,
न कही गई—
केवल स्वप्न में गूँजी।
तरंग, स्मृति, भय, प्रेम और शून्य—
ये हैं ब्रह्मांड के पाँच अध्याय,
और अचेतन के भी।
जैसे इलियड ने युद्ध को गाया,
मैंने यहाँ मौन को गाया।
जैसे गिलगमेश ने अमरता खोजी,
यहाँ अमरता ही शून्यता निकली।
जैसे सिसिफस ने चट्टान ढोई,
यहाँ चट्टान स्वयं चलती रही।
जैसे ययाति ने समय से सौदा किया,
यहाँ समय ने कहा—
“मैं किसी का दास नहीं।”

