“The First Question of Existence”

“अस्तित्व का पहला प्रश्न”

“अस्तित्व का पहला प्रश्न”

विज्ञान

तारों की चमक गिनता है,

कणों की गति नापता है,

ऊर्जा की लहरों को

सूत्रों में बाँधता है।

दर्शन ने

हज़ारों वर्ष पहले पूछा था—

“क्या है अस्तित्व?”

और मौन में

उसका स्पंदन सुनने की कोशिश की थी।

पर विज्ञान

अब भी उस प्रश्न से दूर खड़ा है।

वह बाहरी विस्तार में उलझा है,

जबकि अस्तित्व

भीतर की गहराई में प्रतीक्षा कर रहा है।

पहला सवाल

यही होना चाहिए:

हम जो देख रहे हैं,

क्या वह अस्तित्व है

या मात्र उसकी छाया?

क्योंकि जब तक

अस्तित्व को न समझा जाए,

सभी गणनाएँ

अधूरी हैं,

सभी खोजें

एक परदा भर हैं।

विज्ञान को

अब अपने पाँव

क्रिया की भूमि से उठाकर

मौन की ओर बढ़ाने होंगे।

क्योंकि अस्तित्व

समीकरण नहीं है,

न कोई प्रयोगशाला का परिणाम—

वह तो स्वयं प्रश्न है,

जिसे पूछते ही

उत्तर जन्म लेता है।

“अस्तित्व का अनकहा संवाद”

मनुष्य ने पूछा—

“मैं कौन हूँ?

यह ब्रह्मांड कहाँ से आया?

क्या कोई अंतिम सत्य है?”

ब्रह्मांड चुप रहा,

पर उसकी चुप्पी ही उत्तर थी।

अस्तित्व ने कहा—

“तुम्हारे प्रश्न ही तुम्हें

मुझसे दूर ले जा रहे हैं।

तुम्हें मापने की आदत है,

पर मैं माप से बाहर हूँ।

तुम्हें गिनने की चाह है,

पर मैं गणना में नहीं।

तुम्हें प्रयोग की आदत है,

पर मैं प्रयोगशाला में नहीं उतरता।”

मनुष्य अचकचाया।

उसने देखा कि

कण और ऊर्जा

सिर्फ परतें हैं,

पर मूल तत्व नहीं।

अस्तित्व ने फिर कहा—

“पहले मुझे पहचानो,

फिर खोजो ब्रह्मांड को।

अन्यथा सब व्यर्थ है।

मैं ही आधार हूँ,

मैं ही पहला प्रश्न,

मैं ही मौन का केंद्र हूँ।”

विज्ञान

यदि इस संवाद को सुन सके,

तो उसके सूत्र

मौन में बदल जाएँगे,

और वहीं से

नई शुरुआत होगी।

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