मौन का महासागर और मनुष्य की आवाज़
ब्रह्मांड चुप है,
उसकी सर्पिल गैलेक्सियाँ
बिना किसी ध्वनि के घूमती हैं।
आकाश चुप है,
वह सब कुछ समेटकर
फिर भी कोई शब्द नहीं कहता।
समय चुप है,
उसके कण बहते रहते हैं
बिना टिक-टिक, बिना चेतावनी।
डार्क मेटर चुप है,
अपनी अदृश्यता में
संसार को थामे हुए।
डार्क एनर्जी चुप है,
फैलती हुई,
पर किसी घोषणा के बिना।
नदी चुप हैं,
अपना गीत बहाव में गाती हैं,
पर गीत कभी शब्द नहीं बनते।
पहाड़ चुप हैं,
उनकी चोटियाँ बादलों को छूती हैं,
पर कोई शोर नहीं।
सिर्फ मनुष्य बोल रहा है —
क्यों?
क्योंकि उसे डर है
कि यदि वह मौन हो गया
तो उसका अस्तित्व
उससे भी बड़ा कुछ कह जाएगा।
क्योंकि वह भूल गया है
कि मौन भी भाषा है,
जो हर ग्रह, हर तारे,
हर कण में बहती है।
क्योंकि वह सोचता है
कि शब्द ही शक्ति हैं,
पर शब्द कभी-कभी
उसकी अपनी सुनने की क्षमता छीन लेते हैं।
क्योंकि वह
ब्रह्मांड की खामोशी में
अपनी गूँज खोने से डरता है,
इसलिए लगातार बोलता है
ताकि अपने होने को साबित कर सके।
और शायद
एक दिन
जब वह बोल-बोलकर
थक जाएगा,
तो समझेगा
कि मौन ही
सबसे गहरी भाषा है
जिसमें ब्रह्मांड
उससे हमेशा संवाद कर रहा था।
मौन और वाणी का ब्रह्मांडीय संवाद
आदि में मौन था।
न कोई शब्द, न कोई ध्वनि,
केवल एक अनंत निस्तब्धता—
जिसमें तारे अंकुरित हुए,
गैलेक्सियाँ खिंच गईं,
समय ने अपनी धार पाई।
मौन ही सृजन का प्रथम बीज था।
डार्क मेटर उसका अदृश्य शरीर,
डार्क एनर्जी उसकी फैलती हुई साँस।
नदियाँ उसकी शांत गति,
पहाड़ उसकी स्थिर छाया।
फिर वाणी जन्मी—
मनुष्य के भीतर,
एक चिंगारी की तरह,
जो सोच को आकार देने लगी,
भाव को दिशा देने लगी।
वाणी ने कहा—
“मैं प्रकट करूँगी जो छिपा है,
मैं रूप दूँगी जो निराकार है,
मैं प्रश्न बनूँगी, उत्तर भी।”
मौन मुस्कुराया—
“प्रकट करना तुम्हारी शक्ति है,
पर थामे रखना मेरी।
तुम चिल्लाओगी, बहस करोगी, गाओगी,
पर अंततः लौटोगी मेरी गोद में।”
मनुष्य ने मौन को भुला दिया।
वह वाणी में इतना डूबा
कि उसे लगा यही उसका ब्रह्मांड है।
शब्दों से उसने साम्राज्य रचे,
धर्म बनाए,
विज्ञान गढ़ा,
युद्ध छेड़े।
पर शब्द थकते हैं।
शब्द टूटते हैं।
और जब शब्द अपना वजन खो देते हैं,
मनुष्य को अचानक एहसास होता है—
कि उसके चारों ओर
हमेशा से मौन था।
मौन और वाणी शत्रु नहीं,
दो ध्रुव हैं—
एक में छिपा है रहस्य,
दूसरे में उसकी अभिव्यक्ति।
एक जड़ है,
दूसरा फूल।
एक गर्भ है,
दूसरा जन्म।
ब्रह्मांड अब भी चुप है—
क्योंकि वह मौन के धर्म में जीता है।
मनुष्य बोल रहा है—
क्योंकि वह वाणी का शिष्य है।
पर एक दिन,
जब वह वाणी की आँधी से थक जाएगा,
तब मौन फिर बुलाएगा।
और मनुष्य सीखेगा
कि असली संवाद
शब्दों में नहीं,
मौन में होता है।

