रेत पर एक शरीर पड़ा है —
न कि मरने के लिये, पर जीने के उस भूले हुए ढंग के लिये।
गर्मा-गरम रेत उसकी देह में चुभती है,
जैसे कोई पुराना मंत्र धीरे-धीरे पिघल रहा हो।
देह ऐसे जलती है कि सारी हड्डियाँ शहद की तरह बहने लगें,
और आसपास हँसी की मशीनें—मॉल, स्क्रीन, विज्ञापन—
उनकी रोशनी उसकी त्वचा पर निकलती हुई काली पट्टियाँ बन जाती है।
मोबाइल की घंटी उसके सीने में धड़कती है,
हर नोटिफिकेशन एक सूई है जो उसकी आत्मा में दबाव बनाता है।
वह जवाब देता नहीं—पर शब्दों की झड़ी उसके मुँह से टपकती रहती है,
जैसे किसी ने खाली पेट में कोल्ड-ड्रिंक गिरा दी हो:
मन झनझना रहा है, बुलबुले चुभ रहे हैं, मीठे घूट में जहर सा घुलता जा रहा है।
और चेतना?
वह अब एक ग्लास में तैर रही है —
कंटेनर पारदर्शी, किन्तु भीतर की दुनिया अपारदर्शी।
सॉफ्ट ड्रिंक की तरह: हँसी के बुलबुले ऊपर उठते हैं—
हर बुलबुला एक स्मृति का छोटा विस्फोट —
छूकर लगता है, “यह वही है” पर निचली परत में कड़वाहट बैठी रहती है।
बोलियाँ, वाउचर, लाइक—सब ऊपर की झिल्ली; नीचे अँधेरी दालान जहाँ कोई आवाज़ नहीं देती।
तुम्हारे कप में कामयाबी का फ्रिज-ठंडा कैन रखा है—
लेबल पर लिखा: “सुख”—रंग सुनहरा,
लेकिन घूंट लेते ही तुम पाते हो—यह कुल्फी नहीं, यह एक खालीपन है जिसे रेडीमेड खुशियों ने भरने की कोशिश की है।
सभी स्वाद मिलकर कहता है: “खाओ, भूल जाओ”—पर भूलना भी अब महँगा पड़ता है।
शहर के ऊँचे शीशे उसकी छवि को तोड़ते हैं—
काँच के चेहरे पर वह बार-बार छोटा होता जा रहा है;
हर परदा, हर जाल, हर काउंटर उसके अस्तित्व को विभाजित कर देता है—
और वह खुद को टुकड़ों में ढूँढता है, जैसे किसी पुरानी मूर्तिकला के टूटे हुए नेत्र।
रिश्ते—बड़े-बड़े फ्रेम में टंगी तस्वीरें—
पर उन तस्वीरों की पृष्ठभूमि में आवाज़ नहीं है, केवल हवा।
हवा अब डेटा बन चुकी है; वह सांसों के पैकेट में बिकती है:
“प्रेम—₹299/महीना; उत्साह—विज्ञापन पर सीमित ऑफर; गहरा अर्थ—बंद स्टोर में।”
और तुम खड़े होकर टोकन लेते हो—पर टोकन की पीठ पर लिखा है: “सद्भाव की वापसी असंभव।”
दिन गुज़रता है—एक कालक्रम जिसकी शृंखला केवल फैक्ट-शीट्स के पन्नों पर ही बनी रहती है।
तुम्हारे हाथ में रिपोर्ट, तुम्हारे रिश्तों की वारंटी: 2 साल की शांति, 1 दिन का सन्नाटा।
रात आती है तो सपने नहीं, बल्कि ब्रांडेड रेवरिज़ होते हैं।
नोस्टैल्जिया अब एक प्राचीन प्रमोशन है—”यादों पर 50% छूट!”—और तुम खरीद-खरीद कर भी खाली निकलते हो।
आवाज़ें—टल-मुल यादों की नहीं, बल्कि एआई के अनुनाद की हैं।
“तुम ठीक हो?” — यह प्रश्न नहीं, यह कस्टमर केयर स्क्रिप्ट है।
तुम बोलना चाहते हो पर शब्दों के पास बैटरी खत्म हो चुकी है।
कठोर, निर्जीव, बैटरी-संचालित शब्द।
और फिर, कभी-कभी—एक पल, छोटा सा—
तुमारी छाती अचानक धूम्र-धारा की तरह सिकुड़ जाती है:
एक पुराना गीत जो खो गया था, माँ की हँसी की परछाई, या बचपन की कोई छतरी—
पर यह पल भी अब विज्ञापन की तरह अधिकतम 15 सेकण्ड का क्लिप बनकर रह गया है।
तुम उसे रिवाइंड कर सकते हो, पर नहीं छू सकते।
तुम्हारे अंदर एक नदी बहती है—नदी नहीं, निस्वाद पृष्ठभूमि की आवाज़;
उसमें प्लास्टिक का झुरमुट, पुरानी नोटबुक के पन्ने, और रिश्तों की सूखी पत्तियाँ तैरती हैं।
कभी-कभी तुम नीचे झाँकते हो—न तो जल स्पष्ट है, न साफ;
तुमारी आत्मा का प्रतिबिंब पला-पोसा, फ़िल्टर्ड—”इमोजी-इफाइड”।
यहाँ घोर विडंबना है—
तमाम ज्ञान, तमाम डिग्रियाँ, तमाम शब्द—पर जब बचपन की इकाई पूछती है, “क्यों रोते हो?”—
तुम्हारे पास न कोई उत्तर है, न कोई आँसू का नाम।
तुम्हारे आँसू भी अब डेटा बन चुके हैं—काउंटेबल, मेट्रिक, और रेकॉर्डेबल।
मनुष्य अब अपनी ही रचना में फँसा हुआ है—
वह मशीन बनकर पेट भरता है, और मशीन बनने के बाद आत्मा खो देता है।
तुम्हारी त्वचा पे टेपे हुए विज्ञापन तुम्हें बताते हैं—
“तुम यहाँ हो क्योंकि तुम खरीदार हो।”
और हर बार तुम उस वाक्य को पढ़कर अपने आप को हँसाते हो—एक प्रेरित हँसी, एक rehearsed smile।
अवचेतन—वह विशाल कक्ष जो तुम्हें बार-बार खींचता है—
वहाँ तुम देखते हो कि तुम्हारे बचपन ने कितने बार तुमसे हाथ छुआ था,
और तुमने हर बार उसे छोड़ दिया था, क्योंकि “बड़ों ने कहा था”—
अब वही हाथ तुम्हारे पैरों को खींचते हैं, रेत से बाहर निकालने के लिये, पर तुम हँसते हो—हँसी पर अब भी बिल है।
तुम्हारे सपने अब आउटसोर्स किए गए हैं—किसी और की स्क्रिप्ट में अभिनेता बनना,
और रात को तुम ऑटोप्ले करते हो: सफलता के विज्ञापन, सूक्ष्म उद्धरण, और अतार्किक प्रेरक तस्वीरें।
मन भीतर ही भीतर जलता है—पर आग इतनी धीमी है कि वह केवल छाल से बतियाती है।
फिर एक रात—तुम अपने हाथ में एक ठंडी कैन पकड़ते हो, कैन पर चमकीला लेबल:
“एक क्षण का सुख”—
तुम घूँट लेते हो, और अंदर की चेतना फॉल्ट-लाइट की तरह स्पार्क करती है—
बुलबुले उठते हैं, गीत-बीट्स गूँजते हैं, पर नीचे की परत में कुछ मसलता है—
एक पुरानी किताब का पन्ना, जली हुई फोटो, नाम-रहित पसीना।
और तब अचानक, उस स्पार्क के बीच, तुम सुनते हो—कहीं दूर से—एक आवाज़, पतली पर सच्ची:
“तुम्हारे भीतर एक और रेत है, जो जला कर भी आश्रय देती है।”
यह आवाज़ धमकी नहीं, सलाह नहीं—बस एक संकेत है।
पर कैसे पकड़े उसे, जब हाथों में दो सॉफ्ट-ड्रिंक की कैन हैं, और आँखों में विज्ञापन की परछाइयाँ?
इस कविता का यही अँत—ना समाधान, ना नायक;
सिर्फ यह दृश्य कि कैसे एक पढ़ा-लिखा मध्यवर्गीय इंसान
दौड़ता है, जीतता है, और फिर भी खालीपन में तैरता रहता है—
और कैसे उसकी चेतना, इस ग्लास-जीवन में,
सॉफ्ट-ड्रिंक की बुलबुलों में बंद हो जाती है—मीठी, झंकृत, और घातक।
पर कविता एक अंतिम चित्र छोड़ती है—
तनिक-सा:
रात के एक कोने में, किसी ने एक छोटी-सी काँच की बोतल रख दी है—
अंदर थोड़ा सा रेत, एक सूखा फूल, और एक नाम लिखा है—”याद”।
बोतल की हवा बाहर निकली है, पर फूल अभी भी सनसनाता है—कमजोर, पर मौजूद।
यह कोई समाधान नहीं; यह केवल एक संकेत है कि जहाँ भी चुभन हो, वहाँ भी कुछ बचा रहता है—
एक नन्हा-सा उजला टुकड़ा, जो अवचेतन में भी चमकता है, जब कोई उसे झाँक कर देखे।
तुम्हारी साँसें अब फिर से नोटिफिकेशन की ताल नहीं हैं—वे कुछ धीमी हैं।
काँच की बोतल का फूल झुकता है, एक-एक पंखुड़ी गिरती है, और वह पंखुड़ी रेत पर अँधेरे में तैरती है—
छोटी-सी, कमज़ोर-सी, पर हवा में एक गंध छोड़ती हुई: मिट्टी की, बारिश से पहले की, असली।
और कविता वहाँ रुकती है—तुम्हें वापस नहीं भेजती, पर तुम्हें बताती है कि अवचेतन में उतरना भयानक है,
पर वहाँ से लौटना भी सम्भव है—बहुत धीमी, बहुत नम, और बहुत व्यक्तिगत तरह से।

