1.फ़्रेम के अंदर और बाहर
फ़्रेम के अंदर—
चेहरे मुस्कुराते हैं,
पोज़ में जमे हुए,
आँखों के पीछे का थकान
काटकर हटा दी गई है।
रंग चटख हैं,
हकीकत धुँधली।
सब कुछ व्यवस्थित,
सभ्यता की चमकदार बुकशेल्फ़ पर
सजा हुआ।
फ़्रेम के बाहर—
बिखरी हुई आवाज़ें हैं,
अधूरी हँसी, अधूरी रोटी,
पसीने से भीगी कमीज़,
किसी की टूटी चप्पल।
धूल उड़ती है,
कुत्ते भौंकते हैं,
बच्चे हड़बड़ाकर भागते हैं
और कोई कैमरा क्लिक नहीं करता।
फ़्रेम के अंदर—
इतिहास लिखा जाता है।
फ़्रेम के बाहर—
लोग मिट जाते हैं।
फ़्रेम के अंदर—
सत्य चमकता है
जैसे विज्ञापन बोर्ड।
फ़्रेम के बाहर—
सत्य चुपचाप
अपने ही खून में लथपथ पड़ा है।
फ़्रेम वही दिखाता है
जो दिखाना चाहिए,
फ़्रेम के बाहर वही छुपा है
जो जानना जरूरी था।
फ़्रेम के अंदर सभ्यता है,
फ़्रेम के बाहर उसका मलबा।
2.सभ्यता का सुनहरा फ़्रेम
सभ्यता ने एक सुनहरा फ़्रेम गढ़ा—
चमकता हुआ,
इतना सुंदर कि आँखें चकाचौंध हो जाएँ।
उस फ़्रेम के भीतर
मनुष्य का चेहरा सजाया गया,
उसकी हँसी, उसका धर्म, उसका श्रम,
उसकी आत्मा तक को पॉलिश कर
एक आदर्श चित्र बना दिया गया।
फ़्रेम के बाहर
उसकी असली आकांक्षाएँ थीं—
अनंत आकाश से संवाद करने की चाह,
सितारों के साथ कदम मिलाकर चलने का साहस,
और मस्तिष्क की वह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा
जो हर क्षण फैलना चाहती थी।
पर फ़्रेम ने कहा—
“यहीं रहो,
यहीं तुम्हारा सौंदर्य है,
यहीं तुम्हारी पहचान है।”
इस सुनहरी कैद को
मनुष्य ने धीरे-धीरे
स्वीकृति दे दी।
उसे सिखाया गया—
“फ़्रेम से बाहर अंधकार है,
फ़्रेम के भीतर प्रकाश है।
फ़्रेम के बाहर अराजकता है,
फ़्रेम के भीतर संस्कृति है।”
मस्तिष्क के साहस को
फ़्रेम की दीवारों से बाँध दिया गया।
विचारों की बिजली
जो आकाश फाड़ सकती थी,
उसे एक दीपक की लौ में
सिमटा दिया गया।
ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का महासागर
फ़्रेम की सीमाओं में
तालाब बन गया।
फ़्रेम इतना सुनहरा था
कि धीरे-धीरे मनुष्य ने
अपनी बेड़ियों को आभूषण समझ लिया।
स्वीकृति ही परंपरा बन गई,
परंपरा ही धर्म बन गई,
धर्म ही सुरक्षा बन गया।
फ़्रेम से बाहर जाने की
हर कोशिश को
पागलपन कहा गया।
फ़्रेम के भीतर रहने को
सभ्यता कहा गया।
और इस तरह
मनुष्य की अदम्य क्षमता—
उसकी उड़ान, उसका साहस,
उसका असीम मस्तिष्क—
सब सुनहरी सीमाओं में
कैद होकर चमकने लगे।
सभ्यता ने यह छल
इतनी निपुणता से रचा
कि मनुष्य खुद
अपनी कैद का पहरेदार बन गया।
अब वह सोचता है—
फ़्रेम से बाहर जाना अपराध है,
जबकि असली जीवन,
असली स्वतंत्रता,
अभी भी फ़्रेम के बाहर ही इंतज़ार कर रही है।
3. सुनहरे फ़्रेम की अंतर आत्मा
सुनहरे फ़्रेम ने केवल चेहरे नहीं क़ैद किए,
उसने जीवन को ही खाँचों में बाँट दिया।
विवाह—
एक चमकता हुआ फ़्रेम,
जहाँ दो आत्माओं की स्वतंत्रता को
समाज की स्वीकृति की जंजीर से बाँध दिया गया।
प्रेम अब अनंत आकाश की उड़ान नहीं रहा,
वह अब फ़ोटो एलबम के मुस्कराते हुए
आशीर्वादित क्षणों में कैद है।
मनुष्य सोचता है—
“यही प्रेम है,”
जबकि बाहर
उसकी आत्मा अब भी
अज्ञात दिशाओं में भटकने को बेचैन है।
कैरियर—
एक दूसरा सुनहरा फ़्रेम,
जहाँ श्रम और सपनों को
सी.वी. के पन्नों पर
सजाकर रखा गया है।
जो भीतर है वही योग्य है,
जो बाहर है—
“व्यर्थ” कहा जाता है।
अनंत संभावनाएँ,
जो मस्तिष्क को ब्रह्माण्ड से जोड़ सकती थीं,
अब एक दफ़्तर की घड़ी में टिक-टिक करती हैं।
फ़्रेम कहता है—
“यही सफलता है।”
राज्य—
सुनहरा फ़्रेम सबसे विशाल,
जहाँ नागरिकता की मुहर लगाकर
मनुष्य को अनुशासन की तस्वीर बना दिया गया।
विरोध करने वाली आँखों को
फ़्रेम के बाहर धकेल दिया गया,
और कहा गया—
“यह देशद्रोह है।”
राज्य का फ़्रेम
इतना चमकदार है
कि लोग उसमें सुरक्षा देखते हैं,
पर भूल जाते हैं कि
बाहर ही असली स्वतंत्रता है।
तकनीकी मीडिया—
नवीनतम सुनहरा फ़्रेम,
जहाँ रियल नहीं,
सिर्फ़ रील ही दिखती है।
यहाँ हर भावना
एक स्टेटस अपडेट है,
हर आँसू
एक फ़िल्टर,
हर अनुभव
एक ‘लाइक’।
मनुष्य मनुष्य को
सीधे आँखों से नहीं देखता,
बल्कि फ़्रेम के भीतर
पिक्सल की परछाईं में पहचानता है।
यहाँ अस्तित्व नहीं,
केवल प्रस्तुति है।
लक्ष्य है—
कैसा दिखते हो,
न कि क्या जीते हो।
सुनहरे फ़्रेमों का यह जाल
इतना महीन है
कि मनुष्य खुद को
कैद महसूस नहीं करता।
वह सोचता है—
“मैं सभ्य हूँ, सुरक्षित हूँ, सफल हूँ।”
जबकि असल में
उसकी ब्रह्माण्डीय ऊर्जा
धीरे-धीरे निचोड़ी जा रही है
ताकि वह एक सुंदर चित्र बना रहे—
स्थिर, चमकदार,
पर भीतर से निर्जीव।
सभ्यता की इस स्वर्ण-कारीगरी में
हम सब
धीरे-धीरे सजावट की वस्तुएँ बन गए हैं।
और असली जीवन—
जो बहता है, टूटता है, उड़ता है,
अब भी फ़्रेम के बाहर
हमारा इंतज़ार कर रहा है।

