A Shattered Reflection on Flowing Water
टूटे हुए जल पर तैरती परछाईं

टूटे हुए जल पर तैरती परछाईं

सभ्यता—
एक चेहरा नहीं,
बल्कि हज़ार टुकड़ों में टूटा हुआ आईना है,
जिसे हम रोज़ अपनी आँखों के सामने रखते हैं
और मान लेते हैं कि यही हमारा रूप है।

नदियों के जल में झिलमिलाती परछाईं की तरह
सभ्यता कभी स्थिर नहीं,
हमेशा बहती हुई,
हमेशा डगमगाती।
कभी यह हमें गौरव का रूप दिखाती है,
तो कभी विकृत नाक-नक्श
जैसे हम अपनी ही परछाईं को पहचान न पाएँ।

सभ्यता के भवन—
कंक्रीट की ऊँची अट्टालिकाएँ—
दरअसल टूटे हुए शीशे की किरचें हैं
जिन्हें सूरज की रोशनी में चमकाकर
हमने सोने का भ्रम पैदा कर लिया है।
मगर पास जाकर देखो—
हर चमकती सतह
एक चीख़ छुपाती है।

भाषाएँ, ग्रंथ, धर्म और विधान—
सब इस आईने की फ्रेम मात्र हैं,
जो टूटन को छिपाने के लिए बनाए गए हैं।
वे हमें बताते हैं—
“देखो, तुम्हारा चेहरा सुंदर है,
तुम्हारा अतीत गौरवशाली है।”
लेकिन आईना भीतर ही भीतर
हमारे चेहरे को चीरता रहता है,
हमारे सवालों को धुँधला करता रहता है।

सभ्यता का आईना
हमें कभी हमारा असली चेहरा नहीं दिखाता।
वह हमें वही दिखाता है
जो सत्ता चाहती है कि हम देखें—
एक साफ़, नियंत्रित, पैक किया हुआ रूप,
जहाँ गंदगी छिपी रहे
और केवल चमक दिखाई दे।

और हम,
इस टूटे आईने को निहारते हुए
धीरे-धीरे भूल जाते हैं
कि पानी में भी परछाईं होती है—
जहाँ सच्चाई विकृत नहीं,
बल्कि बहती हुई,
पारदर्शी,
मुक्त होती है।

सभ्यता हमें परछाईं बेचती है,
मगर आत्मा की धड़कन छिपा लेती है।
हम उस चमकदार काँच के पीछे
अपने ही खोए हुए चेहरे की तलाश करते रहते हैं।


सभ्यता का आइना
सभ्यता ने हमें चकाचौंध दी—
काँच की ऊँची दीवारें,
लोहे के पुल,
आकाश छूती इमारतें
जिनके भीतर आत्मा के लिए
कोई खिड़की नहीं।
उसने हमें भाषा दी—
पर शब्दों में काँटे छुपाए,
जहाँ संवाद, संवाद नहीं
बल्कि प्रतिस्पर्धा की तलवार बन गया।
उसने हमें घर दिया,
मगर भीतर अजनबीपन की नमी भरी,
जहाँ परिवार
धीरे-धीरे घड़ियों और मोबाइल की
सूचनाओं में घुल गया।
सभ्यता ने हमें रोटी दी
पर रोटी का स्वाद छीन लिया,
क्योंकि भूख अब पेट की नहीं
बल्कि लालच की जेबों की है।
उसने हमें धर्म और नैतिकता दी,
मगर भीतर गहरे क्रोध और ईर्ष्या बोई,
ताकि मनुष्य, मनुष्य से डरता रहे,
और मशीनों के आदेशों का पालन
भेड़ की तरह करता जाए।
सभ्यता ने सहजता की हरी घास काट दी—
उस जगह डामर बिछा दिया
जहाँ कभी बच्चे नंगे पाँव
धरती की धड़कन सुनते थे।
उसने चाँद को विज्ञापन बना दिया,
तारों को गणित की तालिका,
और हवा को
गाड़ियों की धुएँ में
गला घोंटने वाली रस्सी।
मनुष्य जो जंगल की मिट्टी में खेलकर
हँसता था,
अब एक नागरिक मशीन है—
उसकी हँसी सर्कस का अभिनय है,
उसकी चाल
कार्यालय की सीढ़ियों की धुन।
सभ्यता ने हमें अवसाद दिया—
क्योंकि उसने हृदय से धड़कन चुराकर
बैंक खातों में जमा कर दी।
उसने हमें तनाव दिया—
क्योंकि हर साँस, हर कदम
लक्ष्य, उपलब्धि, और तुलना के
चक्रव्यूह में फँसा दिया।
उसने हमें ईर्ष्या दी—
क्योंकि दूसरे का सुख
हमारी असफलता का आईना बना दिया।
और हाँ,
उसने हमें एक सपना भी दिया—
शांति का, सुख का, सहजता का—
जो हर विज्ञापन में चमकता है,
हर चुनावी वादे में गाया जाता है,
हर किताब की प्रस्तावना में लिखा जाता है,
पर कभी हमारी हथेली तक नहीं पहुँचता।
सभ्यता ने विकास का गीत गाया,
मगर उसकी धुन ने हमारे भीतर
स्वतंत्रता का बीज कुचल दिया।
अब हम केवल आगे बढ़ते हैं—
पीछे नहीं देखते,
न अपने गाँव, न अपनी मिट्टी,
न अपने भीतर की चिड़िया
जो अब भी उड़ना चाहती है।
और इस तरह,
सभ्यता ने हमें
मनुष्य से नागरिक बनाया,
नागरिक से उपभोक्ता,
और उपभोक्ता से
एक शांत रोबोट
जो सपनों पर चलता है,
मगर सपने कभी पूरे नहीं करता।

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