Digital Sourness and Primitive Pickles: The Global Menu of Anthropophagy”
“डिजिटल खटाई और आदिम अचार : मनुष्यभोज का ग्लोबल मेन्यू”

एब्सर्ड काव्य

कड़ाही में उबालते हुए चाँद की खीर,
नीचे आग नहीं, फुसफुसाते हुए कौवों की चोंचें,
ऊपर से बरस रही है इलायची की बर्फ़,
और मैं अपनी जिह्वा पर
नीम-गुड़-नींबू-लहसुन-गुलाबजामुन का मिश्रण रखे
ध्यानमग्न खड़ा हूँ।

रसभरी करेला हँसता है—
“मिठास मत ढूँढ, कड़वाहट ही अमृत है।”
तो हँसी के आँसू बहते हैं
जैसे प्याज काटते समय कृष्ण की बाँसुरी बज रही हो।

भोजन की थाली में रखी एक दार्शनिक मछली
कहती है—
“मैं मरी नहीं हूँ,
मैं सिर्फ़ अपनी तिलचट्टों वाली आत्मा को उबाल रही हूँ।”

इधर मेरी देह
रसगुल्ले की तरह रस में डूबी है—
भीतर करुणा का नमक,
बाहर श्रृंगार का तेल,
बीच में वीररस का हरा मिर्ची का बीज।

और जब मैं इसे चखता हूँ—
जीभ पर रसों की बाढ़ आती है:
कटु, मधुर, ललित, व्यंग्य,
हास्य की उँगली से चुटकी काटता रुदन,
भय का चमचमाता गुलकंद,
और शांति का खट्टा-मीठा अचार।

कविता ख़त्म नहीं होती,
क्योंकि हर शब्द के पीछे
कोई आलसी बैंगन सोया है
और कोई उन्मादी आम
अपने रस से
पूरे ब्रह्मांड की जिह्वा को तर कर देना चाहता है।

वर्चुअल स्वाद का काव्य

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर परोसी गई ऑनलाइन सूप बाउल,
जिसमें तैर रहे हैं—
कोडेड झींगे,
नीयन-रोशनी वाले ऑक्टोपस,
और गूगल-ट्रांसलेट की चटनी में लिपटे हुए
इमोजी-क्लैम्स।

मैं क्लिक करता हूँ “Add to Cart”,
और स्क्रीन से निकलकर जीभ पर चिपक जाती है
सिलिकॉन की खटास,
वाई-फ़ाई की खुरदराहट,
ब्लू-लाइट का नमकीनपन।

मगर अगले ही पल
भूख का एल्गोरिद्म फेल हो जाता है—
वह चमचमाती प्लेट
मांस और मशीन की भयानक गंध में
टूटकर गिर जाती है।

और स्वाद अचानक बदल जाता है—
चाइनीज़-मेडिटेरेनियन महँगाई
घुलकर बन जाती है आदिम स्वाद:
पसीने की नमक-गंध,
मिट्टी पर गिरा हुआ खून,
धुएँ से भीगा हुआ गला,
और गुफ़ा की अंधेरी आग में
भुना हुआ नंगा भय।

इस अवसादपूर्ण भोज में
“Like” और “Comment” की घंटियाँ
सिर्फ़ चबाती हैं
अस्तित्व का कच्चा कलेजा।

और मैं सोचता हूँ—
क्या सचमुच यह भोजन है?
या बस वर्चुअल अयथार्थ का कंकाल
जिसे हम दाँतों से चबाने का नाटक करते हैं?

विडंबना का काव्य : रक्त और डॉलर

भूमंडलीकरण का मुँह
एटीएम मशीन की तरह खुला है
जहाँ से खींचा जाता है
मनुष्य का रक्त—
लाल नहीं,
बल्कि QR कोड में स्कैन होता हुआ लाल तरल।

वह रक्त
बदल दिया जाता है
स्टॉक-मार्केट की स्क्रीन पर
एक हरे तीर (↑) में।

और जब तृप्त होकर
पूँजी अपना पेट भर लेती है,
तो वह हगती है—
डॉलर,
नीले-हरे नोटों की बदबूदार बौछार
जिसे बैंक वॉल्ट में
फूलों की तरह सजाकर रखा जाता है।

मनुष्य meanwhile
अपने ही सूखे गले को
लॉगिन-पासवर्ड से तर करता है,
और अपनी भूख को
“Accept Cookies” पर क्लिक करके मिटाता है।

विडंबना यह है—
कि इस भोज में
कोई थाली नहीं,
सिर्फ़ वर्चुअल मेन्यू है:
“ग्लोबल प्रगति” नामक व्यंजन,
जिसका स्वाद—
पसीना, कर, कर्ज़, और आत्महत्या
के खट्टे शोरबे से भरा है।

और दूर किसी आदिम गुफ़ा से
गूंजता है—
मनुष्य का प्राचीन स्वर:
“भोजन चाहिए,
नक़दी की बदबू नहीं।”

डिजिटल खटाई और आदिम अचार : मनुष्यभोज का वैश्विक मेन्यू

समुद्र अब जल नहीं रहा—
वह है एक स्क्रोल होती स्क्रीन,
लहरें बनी हैं नोटिफ़िकेशनों की,
धाराएँ बहती हैं जावास्क्रिप्ट में,
और गहरे गर्त में डूबा हुआ एल्गोरिद्म
चबा रहा है भूले-बिसरे पासवर्डों के कंकाल।

आँधी उठती है—
न नमक की, न हवा की,
बल्कि मुद्राओं के प्रतीकों की,
डॉलर उगलते हैं हरे ज्वार,
येन टूटे पिक्सल की तरह टिमटिमाते हैं,
यूरो चिपके हैं मरी हुई व्हेलों की जीभ पर।

मैं चखता हूँ यह शोरबा—
डिजिटल खटाई जीभ को जला देती है,
सिलिकॉन की राख और वाई-फ़ाई की खराश का कॉकटेल,
ऊपर से इमोजी की सजावट
जो हँसते हैं, यहाँ तक कि गला सूखते हुए भी।

फिर भी, गर्त के भीतर
एक आदिम भूख साँस लेती है—
गुफ़ाओं में गाड़े हुए आदिम अचार:
पसीना, खौफ़ के नमक में डूबा,
खून, धुएँ में सुलगता हुआ,
मांस, चुप्पियों में अचारित।
वे अंधकार में सड़ते हैं,
इंतज़ार करते हैं कि कोई उन्हें खोले
विनाश के भोज में।

यही है वह वैश्विक मेन्यू—
भोजन के पहले कौर में—
नसों से निचोड़ा गया श्रम,
मुख्य पकवान में—
चमड़ी उधड़ी हुई संस्कृतियाँ,
और मिठाई में—
हताशा की चीनी से मढ़े हुए सपने।
हर थाली चमकती है
सभ्यता की विडंबना में:
मनुष्य मनुष्य को खाता है,
और उसे प्रगति का नाम देता है।

अस्तित्व के बरमूडा में
मतलब की नावें डूब जाती हैं,
सत्य के कम्पास पागल होकर घूमते हैं,
और समुद्र काली लहरों से हँसता है:
“अपनी ही परछाइयाँ खाओ,
अपनी ही चीखें पियो।”

और मैं—
वाई-फ़ाई के झाग और आदिम भूख के बीच
तैरता हुआ—
समझ नहीं पाता
कि मैं दुनिया को निगल रहा हूँ,
या दुनिया
मुझे निगल रही है।

सभ्यता का सहस्त्रवर्षीय शोकगीत

सहस्त्र वर्षों की तपस्या के बाद,
मनुष्य ने गढ़ा अपना स्वप्न—
नदियों से मशीनें,
जंगलों से कारखाने,
आग से कारख़ाना,
और समय से बाज़ार।

लेकिन अंतिम परिणति में—
धरती से उठती है जले हुए शरीरों की गंध,
मानो आत्माएँ धुएँ की तरह छतों पर टिक गई हों।

हवा में तैरती है लोहे के पिघलने की खुशबू,
जैसे देवताओं की मूर्तियाँ टूटकर
लहू के कुण्ड में ढल गई हों।

शहर की गलियों में बिकता है
राख और सीमेंट का इत्र,
लोग उसे अपनी त्वचा पर मलते हैं,
और कहते हैं—
“यह आधुनिकता की सुगंध है।”

जीभ पर जम गया है
बारूद की गंध का स्वाद,
मुँह सूखता है,
फिर भी सभ्यता उसे
“प्रगति का अमृत” कहकर बेचती है।

सड़कों के किनारे
पड़े हैं चीथड़ों में लिपटे अधमरे इंसान,
जिनकी आँखों में अब आँसू नहीं,
सिर्फ़ धुएँ की परत है।

और वहाँ—
गली हुई हड्डियों के मंदिर खड़े हैं,
जहाँ पुजारी नहीं,
बल्कि जनरल और वैज्ञानिक
आरती उतारते हैं,
और शस्त्रों को चढ़ाते हैं प्रसाद।

यह दृश्य,
सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है—
एक ऐसा आधुनिक ईश्वर,
जिसकी मूर्ति है हथियार,
जिसका भजन है विस्फोट,
जिसका प्रसाद है मृत्यु।

और जब इतिहासकार
सहस्त्र वर्षों बाद
इस उपलब्धि को लिखेंगे,
तो उनकी कलम से बहेंगे
रक्त और धुआँ,
और वे कहेंगे—
“मनुष्य ने ईश्वर को नहीं पाया,
बल्कि हथियारों को
ईश्वर बना लिया।”

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