“The unexamined life is not worth living.”
“एक अनपरखी जिंदगी जीने लायक नही है”
– सुकरात
“एक अनपरखी ज़िंदगी जीने लायक नहीं है” यह वाक्य दरअसल मनुष्य के पूरे जीवन-दर्शन को चुनौती देता है।
१. भीड़ की पदचाप
मैं भीड़ में था—
सिर झुकाए,
दूसरों की चाल पकड़कर चलता हुआ।
कोई प्रश्न नहीं,
कोई संदेह नहीं।
बस एक धक्का इधर,
एक धक्का उधर।
और मैंने मान लिया
कि यही जीवन है।
पर भीतर एक आवाज़
कहती रही—
“तुम तो पाँव भी नहीं चला रहे,
पाँव तुम्हें चला रहे हैं!”
२. नकली सुरक्षा
अनपरखी जिंदगी
आराम देती है,
मगर वह आराम
कफन के भीतर का होता है।
हम सुरक्षित रहते हैं,
पर जीवित नहीं।
हम नियम मानते हैं,
पर सोचते नहीं।
सुकरात का तीर
यहीं चुभता है—
क्या मृत्यु से पहले ही
हम मर चुके हैं?
३. भीड़ का सत्य
भीड़ हमेशा कहती है—
यही सही है।
मैंने सिर हिलाया
और मान लिया।
भीड़ ने कहा—
यह पाप है।
मैं डर गया
और चुप हो गया।
पर किसने तय किया
कि भीड़ कभी गलत नहीं?
मैंने कभी परखा ही नहीं।
बस बहता रहा
एक झूठे यथार्थ में।
४. अधूरे प्रश्न
मेरी जेबों में
ढेरों उत्तर थे,
पर कोई प्रश्न नहीं।
मुझे यही सिखाया गया—
प्रश्न खतरनाक हैं।
वे विद्रोह को जन्म देते हैं।
इसलिए मैंने
बिना पूछे ही
सब मान लिया।
और यही
मेरी सबसे बड़ी हार थी।
५. अंधकार का आराम
सुविधा से बढ़कर
कठिनाई कौन ढूँढे?
आसान है
अंधेरे में बैठ जाना।
प्रकाश खोजने से पहले
प्रश्न करना पड़ता है।
और प्रश्न
भीतर की नींद तोड़ते हैं।
मैंने नींद को चुना—
क्योंकि सपनों में
ज़िंदगी आसान थी।
पर असल में
मैं सोता ही रह गया।
६. दर्पण से डर
दर्पण मुझे दिखाता था
मेरा चेहरा।
पर मैंने नज़रें झुका लीं।
दर्पण दिखाता था—
झूठ,
डर,
समर्पण।
पर मैं मुस्कुराता रहा
जैसे सब ठीक है।
परखने की हिम्मत
मेरे पास कभी नहीं थी।
७. आत्मा की भूख
मेरी आत्मा भूखी थी
प्रश्नों के लिए।
वह चाहती थी
संवाद, संघर्ष, टकराव।
पर मैंने उसे खिलाया
सिर्फ़ रोटी और आराम।
धीरे-धीरे वह
कंकाल बन गई।
आज मेरी आत्मा
भूख से मर रही है।
और मैं
अब भी पेट भरने की दौड़ में
लगा हूँ।
८. सुविधाओं का जाल
मैंने घर बनाया,
सुविधाएँ जोड़ीं,
सुरक्षा पाई।
परखा कुछ नहीं।
क्योंकि सुविधा ने
मुझे अंधा कर दिया।
सच तो यह है—
जितना जोड़ा
उतना ही मैं
अपने भीतर से खाली होता गया।
९. नकल की ज़िंदगी
मेरे कदम,
मेरे शब्द,
मेरे सपने—
सब किसी और के थे।
मैंने अपना
कुछ गढ़ा ही नहीं।
मैं बस
नकल करता रहा।
और अब
मेरे सामने सवाल है—
क्या मैं कभी
‘मैं’ भी था?
१०. सुकरात की आवाज़
वह कहता है—
“अनपरखी ज़िंदगी जीने लायक नहीं।”
तो क्या मैंने
पूरी उम्र
अजीर्ण जीवन जिया?
क्या मेरी साँसें
सिर्फ़ एक आदत थीं,
अस्तित्व नहीं?
अब देर हो चुकी है शायद,
पर फिर भी
एक प्रश्न उठ रहा है—
क्यों न आज
पहली बार
अपने जीवन को परखा जाए?
सवालों से डंक मारो
तुम्हें लगता है
तुम महान हो—
धन, सत्ता, प्रतिष्ठा
सब तुम्हारे पास है।
पर भीतर?
तुम एक सुस्त घोड़े की तरह
नींद में डूबे पड़े हो।
मैं सुकरात हूँ,
तुम्हारा गोजर (गैडफ्लाई)—
छोटा, बेचैन,
पर सवालों से भरा।
मैं डंक मारूँगा
तुम्हारे आत्मसंतोष को,
तुम्हारी जड़ता को,
तुम्हारे झूठे यश को।
सवाल हैं मेरे हथियार।
वे कटार नहीं,
पर कटार से तीखे हैं।
वे तलवार नहीं,
पर तलवार से ज़्यादा गहरे हैं।
मैं पूछूँगा—
क्या तुम सचमुच जानते हो
कि न्याय क्या है?
क्या तुम सचमुच समझते हो
कि सद्गुण क्या है?
या तुम सिर्फ़
भीड़ के सुर में
सिर हिलाते रहते हो?
मेरे सवाल
तुम्हारे आराम को तोड़ेंगे।
तुम चिढ़ोगे,
तुम गुस्से में आओगे,
तुम मुझे
असभ्य कहोगे,
देशद्रोही कहोगे।
पर यह डंक ज़रूरी है—
क्योंकि बिना इसके
तुम सोते रहोगे
और धीरे-धीरे
मर जाओगे।
घोड़े की ताक़त
तभी सार्थक है
जब वह जागा रहे।
सभ्यता की ताक़त
तभी सही है
जब वह सोचती रहे।
मैं सवालों का डंक हूँ,
और सवाल ही मेरी सांस हैं।
तुम मुझे मार सकते हो,
जहर पिला सकते हो—
पर मेरी विरासत
हर युग में जीवित रहेगी।
क्योंकि सवाल
मरते नहीं।
वे उड़ते हैं—
एक गोजर की तरह,
एक डंक की तरह,
मनुष्य की आत्मा को
जगाने के लिए।
तो याद रखो:
सुकरात कहता है—
“सवालों से डंक मारो।
सोए हुए समाज को जगाओ।
यही सबसे बड़ा धर्म है।”
भले ही एथेंस जैसा मदहोश अश्व
उसकी हत्या कर देता हो…
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