“Four Metaphors: A Song of the Self”

चार रूपकों की आत्म-गाथा

1. भीतरी रेगिस्तान का तीर्थयात्री
मैं चला उस ओर
जहाँ रेत जल की जगह साँस लेती है,
जहाँ हर कण राख में बदली हुई स्मृति है।
मैं कोई साधारण यात्री नहीं—
मैं वह हूँ जो बंजरता में जल का सपना देखता है।
मेरी प्यास ही मेरी प्रार्थना है,
और हर कदम—
एक प्राचीन मंदिर की सीढ़ी।

2. अनुभवों की भूलभुलैया का नाविक
मुझे समुद्र नहीं मिला,
मगर अनुभवों की गलियाँ मिलीं,
जो दीवारों की तरह ऊँची थीं
और दरवाज़ों की तरह छलपूर्ण।
मैं नाविक था—
बिना नाव, बिना दिशा,
हर मोड़ मुझे एक नए प्रश्न की ओर फेंक देता।
मैंने जाना:
अनुभव ज्ञान का वचन नहीं देते,
सिर्फ़ और गहरी उलझनों की प्रतिध्वनि देते हैं।

3. अस्तित्व की जंगली भूमि का बंजारा
मैं ठहरा नहीं—
मैंने हर ठहराव को विदाई की तरह जिया।
धरती के भूभाग मेरे पाँवों के नीचे काँपते रहे,
मानो वे कह रहे हों—
“यहाँ कोई घर नहीं, केवल गुजरगाह है।”
मैंने देखा:
अस्तित्व एक बाड़े में कैद नहीं होता,
वह हिरण की तरह जंगली है,
बिजली की तरह अप्रशिक्षित।
मैं बंजारा था—
जिसका धर्म केवल चलना था।

4. अर्थों के जंगल का भटकता हुआ
अंत में मैं पहुँचा—
जहाँ शब्द पेड़ों की तरह उगते थे
और अर्थ बेलों की तरह एक-दूसरे को जकड़ते थे।
मैंने कोशिश की काटने की,
लेकिन हर शाख़ के भीतर नया अर्थ फूट आता।
मैं भटका,
भटकना ही मेरा सत्य बन गया।
यहाँ न मुक्ति थी, न मंज़िल,
सिर्फ़ भाषा का असीम जंगल—
जिसमें हर आवाज़
किसी और आवाज़ की परछाईं थी।

उपसंहार
इस तरह मैंने चार बार जन्म लिया,
चार बार मर गया।
मैं तीर्थयात्री भी था, नाविक भी,
बंजारा भी और भटकने वाला भी।
शायद मनुष्य होना
इन्हीं चार छायाओं का एक साथ होना है।

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