जो नहीं है, उसी में मैं बहा हूँ
जो नहीं है, वह मेरे भीतर बहता है। एक अनदेखा, अनछुआ सागर, जिसमें मैं डूबा हूँ, फिर भी तैर रहा हूँ। यह शून्यता नहीं, यह तो अनंत की गोद है, जहाँ हर सवाल एक लहर बनकर टकराता है और जवाब कहीं गहरे में डूब जाता है।
मैं कौन हूँ? यह सवाल मेरे साथ चलता है, मेरे कदमों की छाया बनकर, मेरे साँसों की गूँज बनकर। चेतना एक अनघट कैनवास है। उस पर रंग नहीं, केवल रिक्तता की रेखाएँ हैं। मैं उन रेखाओं को छूता हूँ, उन्हें पढ़ने की कोशिश करता हूँ, पर वे हर बार एक नया अर्थ गढ़ देती हैं।
क्या मैं वह हूँ जो दिखता है? या वह जो छिपा है, उस अनछुए कोने में, जहाँ शब्द थम जाते हैं और मौन बोलने लगता है? स्वान्वेषण एक यात्रा है, बिना नक्शे, बिना मंजिल। मैं चलता हूँ, रेत पर नंगे पाँव, जहाँ हर कदम एक नया प्रश्न छोड़ जाता है। जो नहीं है, उसी की तलाश में मैं भटकता हूँ। वह जो नहीं दिखता, फिर भी मेरे भीतर साँस लेता है। वह जो नामहीन है, फिर भी मेरे नाम को अर्थ देता है।
शून्यता मेरी सखी है। वह मुझे बुलाती है, अपने गहरे आलिंगन में। वह कहती है, “आ, देख, मैं रिक्त नहीं, मैं अनंत हूँ।” मैं उसमें उतरता हूँ, अपनी परछाइयों को पीछे छोड़कर।
हर बार जब मैं सोचता हूँ कि मैंने स्वयं को पा लिया, वह हँसती है और कहती है, “अभी और गहरा डूब।”यह चेतना का खेल है। एक ऐसा खेल, जहाँ मैं खिलाड़ी भी हूँ और मैदान भी। जहाँ जीत और हार का कोई अर्थ नहीं, केवल खोज का सुख है। मैं उस अनछुए को छूना चाहता हूँ, जो मेरे भीतर और बाहर, दोनों जगह बिखरा है। वह जो नहीं है, उसी में मैं बहा हूँ। वह जो अनछुआ है, उसी में मैं समाया हूँ।
जो नहीं है, उसी में मैं समाया हूँ
मैं एक बिंदु हूँ, अनंत के सागर में। जो नहीं है, वह मुझमें साँस लेता है। चेतना की शून्यता कोई रिक्तता नहीं, वह एक दर्पण है, जिसमें मैं अपने असंख्य रूप देखता हूँ। हर बार जब मैं उसे छूने की कोशिश करता हूँ, वह मुझसे दूर सरक जाता है, जैसे नदी में बहता जल, जो हथेली में थमता नहीं।
क्या मैं यह शरीर हूँ, जो मिट्टी से बना और मिट्टी में मिल जाएगा? या मैं वह चिंगारी हूँ, जो समय के परे जलती है? स्वान्वेषण एक तीर्थयात्रा है, जहाँ मंजिल नहीं, केवल पथ है।
मैं चलता हूँ, और हर कदम पर मेरा स्वयं मुझसे पूछता है—कौन हूँ मैं? शून्यता मेरा गुरु है। वह मुझे सिखाती है कि जो दिखता है, वह माया है। जो नहीं दिखता, वही सत्य है। मैं उस सत्य को खोजने निकलता हूँ, पर हर बार वह मुझे अपने भीतर खींच लेता है। मैं हूँ, फिर भी नहीं हूँ। मैं बह रहा हूँ, उस अनछुए में, जो मेरे भीतर और बाहर, दोनों जगह है।
“Adrift in Nothingness”


