मूढ़ बोध गाथा
(भाग 1 – विविधता में एकता खोजता एक मूढ़)
मैं मूढ़ हूं।
मैं प्रकृति को समझने चला था
बुद्धि के पांवों में शास्त्रों की पगड़ियां बांधकर
ध्यान, तर्क, विवेचन, व्याख्या
सब उठाकर उसके सामने रख दिया –
जैसे कोई बच्चा खिलौनों से ईश्वर को बहलाने चला हो।
मैं मूढ़ हूं।
प्रकृति को महसूस करने में
तल्लीनता चाहिए होती है – भीतर उतरती हुई
तादात्म्य चाहिए होता है – स्वत्व विसर्जित करता हुआ
जहां मैं नहीं, केवल वह हो।
पर मैं गया था मैं को लेकर।
मैं लेकर गया था ज्ञान और पांडित्य का बोझ,
और वहां केवल मौन था – जो किसी श्लोक में नहीं आता।
मैं मूढ़ हूं।
मैंने पहाड़ों से पूछा –
तुम इतने शांत क्यों हो?
मैंने झरनों से पूछा –
तुम इतना बहते क्यों हो?
मैंने नदियों को देखा –
वो बहती रहीं बिना उत्तर दिए।
चिड़ियों ने चहचहाया –
और मैं शब्दकोश में उनके अर्थ ढूंढने लगा।
मैं मूढ़ हूं।
मैंने सोचा –
हर पक्षी की आवाज़ का कोई व्याकरण होगा,
हर जानवर की गति का कोई नियम होगा,
हर जंगल की बनावट कोई ज्यामिति होगी।
मैं नियम खोजता रहा
और वो जीवन जीते रहे।
विविधता का इतना विराट विस्तार था
कि उसमें समानता की कोई एक लकीर मुझे नहीं मिली।
और मैं उस एक सूत्र को ढूंढता रहा,
जो सबको बांध सके –
शायद शास्त्रों के लिए,
या मेरी समझ के लिए।
और इसी खोज में
मैंने जो था, उसे कभी देखा ही नहीं।
मैंने जीवन गंवा दिया –
क्योंकि मैं जीवन के भीतर
उसके स्वाभाविक बहाव में उतरने के बजाय
उसे मापता रहा, गिनता रहा, पकड़ता रहा।
मैं मूढ़ हूं –
यह जानने में ही मेरी मुक्ति की कोई संभावना है।
तब शायद
किसी सुबह
एक पत्ता जब बिना कारण गिरता है
मैं बिना प्रश्न के उसे देख सकूं।
मूढ़ बोध गाथा – भाग 2
मैं
हर ध्वनि में अर्थ खोजता रहा
हर चुप्पी में संकेत
हर हरकत में कोई नियम
हर बदलाव में कोई सिद्धांत
मैं
झरने की अराजकता में
कोई तराजू लिए खड़ा था
कि उसका बहाव
मेरे सूत्रों से मेल खा जाए
मैं
पक्षी की चहचहाहट में
व्याकरण की तलाश करता रहा
उसकी उड़ान में दिशा
उसकी चोंच में कोई भविष्यवाणी
किंतु वह
न दिशा जानता था
न उद्देश्य
मैं
जंगल में घूमते जानवरों को
अपने व्यवहार-सिद्धांत से
बाँधने चला
और वे हँसते हुए
घने वृक्षों के पीछे
ओझल हो गए
मैं
एक संन्यासी नहीं
एक गणक बन बैठा था
जो हर अनुभव को
गिनने में लगा था
और हर गिनती में
खो बैठा था अनुभव
प्रकृति मुझे बुलाती रही
मैं उसे परिभाषित करने में लगा रहा
वह गाती रही, बहती रही, बढ़ती रही
मैं छंद गढ़ता रहा
और उसी में गुम हो गया
जहाँ कोई संगीत नहीं था
सिर्फ ध्वनि थी —
मात्राओं में बाँधने के लिए
आज समझा हूँ —
उसका होना
मेरे न होने की शर्त पर था
उसकी गति
मेरे ठहरने से जन्मी थी
उसकी लय
मेरे अनलय से
मैं
जो उसे पाना चाहता था
मूढ़ था
क्योंकि मैं
अब तक खुद को
खोने को तैयार नहीं था।
मूढ़ बोध गाथा – भाग तीन
(स्वीकृति का स्वर्ग)
प्रकृति में कोई नियम नहीं
जो मनुष्य की बुद्धि को बांध सके
वह लय में है
पर गणना से परे है
वह रूप में है
पर किसी प्रतिमा की परिभाषा में नहीं।
वह स्वीकृति है—
जैसे झील स्थिर होकर भी हर लहर को स्वीकारती है
जैसे आकाश पक्षी को मार्ग देता है
बिना यह पूछे कि वह लौटेगा भी या नहीं।
वह गति है—
मगर बिना लक्ष्य के
वह लय है—
मगर बिना संगीत के
वह अनुभव है—
जिसे शब्द छूते नहीं
बस मौन में घटता है।
मैं जब तक उसे समझने में लगा रहा
वह मुझसे दूर होती गई
मैं जब तक उसे पकड़ने चला
वह मेरी पकड़ से बाहर होती गई
मैं जब थका
और बैठ गया उसी चट्टान पर
जहाँ से दौड़ शुरू की थी
वहीं पहली बार हवा ने मेरा नाम लिया।
प्रकृति ने मुझसे कुछ नहीं माँगा
सिर्फ मेरा होना
मगर मैं उसे देने को
सारी साधनाएँ उठाकर पहुँचा
और खाली लौट आया।
अब समझा हूँ
विविधता में जो लय है
वह समता नहीं
स्वीकृति है
हर असमान चीज को उसी के रूप में
पूर्ण मान लेना
यही प्रकृति है
और यही उसका स्वर्ग।
मैंने खुले स्पेस को दीवारों से रोका —
दीवारें जो मैंने खुद गढ़ीं —
भाषा की, धर्म की, संस्कृति की,
राष्ट्र की, जाति की, वर्ग की।
मैंने उन्हें प्रकृति पर थोप दिया
जैसे कोई आदेश हों मेरे भीतर की सुरक्षा के,
पर वे बन गए मेरे भय की दीवारें।
मैंने सोचा मैं संरक्षित हूं
पर मैं कैद हो गया अपने ही बनाए घेरे में,
मैंने समझा मैं विकास कर रहा हूं
पर मैं केवल प्रकृति से और दूर जा रहा था।
प्रकृति ने कुछ नहीं कहा
वह बस बहती रही, बढ़ती रही,
मेरी दीवारों को चुपचाप सहती रही
जैसे वह जानती हो —
कि एक दिन मैं थककर लौटूंगा,
दीवारों से बाहर आऊंगा
और उस खुले आयाम में साँस फिर से लूंगा
जहां सब स्वतंत्र हैं
और मैं भी।
कविता: धारणा की मूढ़ता
(एक लंबा गहन उतराव)
मनुष्य
धारणाओं में जीता है –
जैसे कोई चिड़िया
अपनी कल्पनाओं के घोंसले में बैठ
आकाश को भूल जाती है।
वह सोचता है
कि भाषा ही सच है,
कि संस्कृति ही पहचान है,
कि धर्म ही दिशा है,
और विचार ही अस्तित्व।
वह अपने चारों ओर
बुनता है एक पारदर्शी दीवार –
जिसे वह “मैं” कहता है।
वह दीवार उसे सुरक्षा देती है,
पर वह भूल जाता है
कि सुरक्षा
कभी-कभी सबसे बड़ा बंधन होती है।
वह कहता है –
“यह मेरा देश है,
यह मेरी जाति है,
यह मेरी परंपरा है,
यह मेरी परिभाषा है।”
और इसी “मेरे” में
वह खो देता है
वह जो वास्तव में उसका था –
स्वतः बहने वाली अनुभूति
जिसमें न कोई नाम है
न कोई राष्ट्र।
धारणाएँ
एक एक करके
उसके अनुभवों को रंग देती हैं –
जैसे कोई चित्रकार
हर रंग को एक नाम दे दे
और कहे
“नीला सिर्फ आकाश के लिए है,
हरा सिर्फ पेड़ों के लिए।”
वह भूल जाता है
कि रंग भी स्वतंत्र हैं,
जैसे भाव होते हैं,
जैसे प्रेम होता है
जो किसी परिभाषा का मोहताज नहीं।
मनुष्य
हर धारणा को
पवित्र मान बैठा है –
वह धारणा
जो कभी किसी ने सत्ता के लिए रची,
या भय में,
या मोह में।
वह नहीं पूछता
कि यह विचार
मेरे भीतर आया कैसे?
वह नहीं देखता
कि क्या यह विचार
मेरे हृदय से निकला है
या किसी ग्रंथ के आदेश से?
वास्तविकता
धारणाओं से परे है –
एक ऐसा निर्विकार शून्य
जिसमें न नाम है
न रूप।
वह शुद्ध होना है,
अनुभव का एक खुला आकाश
जहाँ सबकुछ घटता है
बिना परिभाषित हुए।
यदि कोई पूछे –
“तुम कौन हो?”
तो वह कहता है –
“हिंदू, मुसलमान, ईसाई,
भारतीय, अंग्रेज़,
शिक्षक, वैज्ञानिक, कलाकार…”
पर यदि वह थोड़ी देर मौन हो जाए
तो भीतर से एक उत्तर फूटेगा –
“मैं एक बहती अनुभूति हूँ,
प्रकृति की तरह,
जो न बँधती है
न बाँधती है।”
धारणाएँ
आसान उत्तर हैं
मुश्किल प्रश्नों के लिए।
और मनुष्य
उन्हीं आसान उत्तरों में
जीवन की पूरी कठिन कविता
भुला देता है।
इसलिए
जो मुक्त होना चाहे –
उसे पहले अपनी धारणाओं का अंत करना होगा।
उसे एक बार
खाली होना होगा
जैसे आकाश,
जैसे मौन,
जैसे प्रेम
जो बिना किसी नाम के भी
पूर्ण होता है।
मूढ़ बोध गाथा


