“सीमाओं का मनुष्य”
मनुष्य—
ज्ञान का अभिमानी यात्री,
हाथ में उपकरण,
आँखों में आकाश,
और भीतर—
एक अनदेखी दीवार।
वह कहता है—
“मैं जानता हूँ ब्रह्मांड को,”
और उसकी आवाज़ में
सदियों का विज्ञान गूँजता है,
पर उसकी हर खोज
उसकी इंद्रियों की
लंबी परछाईं भर है।
दूरबीन से उसने
तारों को पास बुलाया,
सूक्ष्मदर्शी से
कणों की दुनिया खोली,
मशीनों से मापा समय,
और यंत्रों से बाँधा प्रकाश—
पर क्या उसने
सीमा तोड़ी?
या बस
सीमा को और आगे खींच दिया?
उसकी आँखें ही
कैमरे बन गईं,
उसके कान ही
रेडियो में ढल गए,
त्वचा ने सेंसर का रूप लिया,
और मस्तिष्क—
एक विशाल गणना-यंत्र बन बैठा।
पर हर यंत्र
उसी भाषा में बोलता है
जिसे उसकी इंद्रियाँ समझती हैं,
हर खोज
उसी चौखटे में कैद है
जिसे उसकी चेतना ने गढ़ा है।
वह प्रकाश से आगे नहीं देख सकता,
क्योंकि उसकी आँखें
प्रकाश की बंदी हैं।
वह समय से बाहर नहीं सोच सकता,
क्योंकि उसकी चेतना
क्षणों में बँटी है।
वह अंधकार को भी
प्रकाश की अनुपस्थिति से ही समझता है,
और शून्य को भी
किसी भरे हुए के खाली होने से।
कितना कम जानता है मनुष्य—
और कितना अधिक जानने का
दंभ पालता है।
उसकी हर उड़ान
एक सीमित पंख की उड़ान है,
जिसे वह अनंत का नाम दे देता है।
शायद ब्रह्मांड
उसके सामने नहीं खुलता,
क्योंकि वह
उसे अपने ढाँचे में ढालना चाहता है।
और जो उसके ढाँचे में नहीं आता—
वह उसे
“अज्ञात” कहकर
भुला देता है।
मनुष्य—
ज्ञान का निर्माता नहीं,
सीमाओं का चित्रकार है,
जो हर रेखा को
क्षितिज समझ बैठता है।
और क्षितिज—
हर बार
उससे एक कदम दूर
मुस्कुराता रहता है।

