मूढ़ बोध गाथा
“धर्म की मेरी मूढ़ता”
धर्म…
कितना स्वाभाविक,
जैसे जल में बहाव,
जैसे सूरज की किरणें बिन बुलाए छू जाएं त्वचा,
जैसे जीवन—
सांस की सहज लय।
पर मैंने धर्म को समझा
किसी ग्रंथ की परिभाषा में,
किसी मठ की मर्यादा में,
किसी भाषा, किसी लिपि,
किसी वेश, किसी परंपरा के नाम में।
मैंने धर्म को बाँधना चाहा—
वस्त्रों में, नियमों में,
कर्मकांडों की शृंखलाओं में।
मैंने सोचा
धर्म वही है जो मुझे बताया गया,
जिसे मैंने सुना,
पढ़ा,
पढ़ाया गया।
पर मैं भूल गया…
धर्म तो हर प्राणी की स्वाभाविक गति है,
एक मौन पुकार,
एक अंतरंग स्पंदन
जो किसी शब्द, किसी संकल्पना का मोहताज नहीं।
मैंने धर्म को देखा
दीवार बनाते हुए,
“यह तुम्हारा नहीं” कहते हुए
किसी को दूर करते हुए,
पर भीतर कुछ कांप गया।
क्या यह धर्म था
या मेरी धारणा की मूढ़ता?
क्या मैंने धर्म को समझा
या केवल उसे ढोता रहा?
मैंने अपने भीतर
धर्म के नाम पर अज्ञान को
पोषित किया वर्षों तक,
और उसे ही ‘ज्ञान’ समझता रहा।
अब धीरे-धीरे
धारणा का पर्दा उठ रहा है—
धर्म वहां नहीं है
जहां मैंने उसे खोजा,
वह तो वहीं था
जहां मैं स्वयं भी नहीं था—
प्रत्यक्ष में,
सांस के स्पर्श में,
स्नेह की एक नजर में।
अब मैं जानता हूं,
धर्म को बांधना
मेरी सबसे गहरी मूढ़ता थी।
और इसी बोध में
शायद धर्म पहली बार
मुझमें घटने लगा है—
बिना नाम,
बिना प्रमाण,
बिना आग्रह।
धर्म की धारणा —
एक भीतरी भूल
जिसे मैंने जीवन का सिरोमोर समझा
जिसे मैंने पीढ़ियों से चले आए शब्दों में
शाश्वत मान लिया।
मैंने धर्म को
वेदों की वाणी में खोजा,
उपनिषदों की चुप्पी में साधा,
शास्त्रों के पृष्ठों में कैद किया
और कहा —
यही है धर्म।
मैंने उसे मूर्तियों में देखा,
कपड़ों के रंग में,
मंदिर की दिशा में,
भाषा के उच्चारण में,
संप्रदायों की रेखा में
और यह भी नहीं सोचा
कि मैं क्या कर रहा हूँ —
एक प्रवाह को दीवारों में बाँध रहा हूँ।
मेरी मूढ़ता इतनी सघन थी
कि मैं धर्म को अनुभव नहीं कर सका —
वह जो हर श्वास में आता है,
जो करुणा में खुलता है,
जो मौन में भी प्रकट होता है,
जो सहज है, निर्दिष्ट नहीं।
मैंने प्रतीकों की पूजा की,
भाव की नहीं;
मैंने विचारों की रक्षा की,
जीवन की नहीं।
धर्म,
जो स्वभाव है,
जो वर्तमान है,
जिसे किसी भाषा की जरूरत नहीं,
किसी विशेष पोशाक की,
किसी जाति, रंग, लिपि या व्यवस्था की नहीं —
उसे मैंने
अपने ही भ्रमों में जकड़ लिया।
अब मैं यह स्वीकार करता हूँ —
धर्म के नाम पर
मैंने दीवारें खड़ी कीं,
दूसरों को बाँटा,
खुद को ऊँचा माना,
और फिर भी सोचा —
मैं धार्मिक हूँ।
किंतु आज
जब भीतर कोई मौन फूटता है,
तो मैं देखता हूँ —
धर्म तो वही था
जो मैंने कभी जाना ही नहीं।
अब मैं कहता हूँ —
मैंने भूल की,
धर्म को बाँधने की भूल।
मैंने अपनी ही सीमाओं को
धर्म का नाम दे दिया।
अब मैं उस मूढ़ता को देख पा रहा हूँ —
जो ज्ञान के मुखौटे में छिपी थी।
अब धर्म को
मैं बाँधना नहीं चाहता।
उसे बस
स्वतः बहने देना चाहता हूँ —
मेरे भीतर,
तुम्हारे भीतर,
हम सब के भीतर।
स्वीकृति से जन्मी एक कविता
संस्कृति की मूढ़ता
(मेरे अपने अज्ञान की स्वीकृति में)
मैंने संस्कृति को
पवित्र माना,
अविचल, अपरिवर्तनीय,
एक ऐसा दीपक
जो युगों से जलता चला आ रहा है
और जिसे बुझाना अपराध समझा मैंने।
मैंने संस्कृति को
दीवार की तरह खड़ा किया —
जिसके भीतर मैं सुरक्षित था,
जिसके बाहर सब ‘पराया’ था।
मैंने उन दीवारों को
अपनी पहचान बना लिया।
पर अब समझता हूँ —
वह दीपक कभी स्थिर नहीं था।
वह तो हवाओं से संवाद करता रहा
उसका प्रकाश बदलता रहा
रंग, ताप, और दिशा में।
पर मैंने उसकी लौ को
एक रूप में बाँधने की मूढ़ता की।
मैंने लोकगीतों को
शास्त्र बना डाला,
नृत्य की थिरकन को
नियमों में जकड़ दिया,
कहानियों को
संहिता बना दी,
और विचारों को
आज्ञा।
मैंने संस्कृति की जीवंतता को
पत्थर कर दिया,
जैसे वह कोई समाधि हो
जिसे छूना भी
विरुद्ध हो ‘संस्कारों’ का।
अब जब मैं
संस्कृति की मूढ़ताओं को देखता हूँ —
मैं खुद को देखता हूँ।
क्योंकि संस्कृति कोई बाहर की वस्तु नहीं थी,
वह मेरी ही देह पर उकेरे गए विचारों की भाषा थी,
जिसे मैंने सत्य मान लिया।
अब मैं यह स्वीकार करता हूँ —
कि मेरी संस्कृति की मूढ़ता
किसी समाज या परंपरा की गलती नहीं,
मेरी अपनी जड़ता थी
जो प्रश्न से डरती रही,
जो परिवर्तन से काँपती रही।
संस्कृति, यदि जीवित है
तो वह बहती है,
रूप बदलती है,
दूसरों से मिलती है,
जैसे नदी, जैसे वाणी, जैसे स्वप्न।
मैं अब संस्कृति को
सुनता हूँ —
जैसे कोई लय
जो बनती है,
बिखरती है,
फिर बनती है।
और मैं
अपनी मूढ़ता को
उस लय में विसर्जित करता हूँ।
भाषा की मूढ़ता
(एक अंतरंग विवेचन)
भाषा।
मनुष्य की सबसे महीन त्वचा,
भीतर से भी भीतर की चमड़ी,
जहाँ संवेदना अपना पहला स्पंदन पाती है।
हम सोचते हैं
भाषा हमारी अभिव्यक्ति है—
मगर यह भूल जाना भी भाषा में ही होता है
कि भाषा हमें भी गढ़ती है
वह एक ऐसा साँचा है
जिसमें हमारा अनुभव पिघलकर जड़ हो जाता है।
भाषा, जो पहले संवाद थी,
धीरे-धीरे प्रमाण बन गई।
अब हम उसे नहीं कहते
जिसे हम अनुभव करते हैं,
हम उसे कहते हैं
जो भाषा कहने देती है।
शब्द —
कभी प्रेम की तरह झरते थे,
अब परिभाषाओं की तरह टिके हैं।
मैंने देखा है,
भाषा ने कैसे भावों को
वाक्य-विन्यास में कस कर जड़ कर दिया—
जैसे कोई चिड़िया उड़ने से पहले
पिंजरे की सलाखें गिनती हो।
और मूढ़ता यह है कि
हम भाषा की सीमा को
सत्य की सीमा मान बैठे हैं।
कितनी बार मैंने
एक चुप्पी को कहते-कहते
वह सब कह दिया
जो वह चुप्पी नहीं थी।
कितनी बार
एक शब्द ने
वह सब तोड़ दिया
जो एक स्पर्श बना सकता था।
भाषा में प्रवेश करते ही
मैंने पाया कि
हर शब्द अपने पीछे
हजारों वर्षों की धारणाओं की परछाइयाँ लिये चलता है।
“प्रेम”
कितनी बार यह शब्द
मुझे प्रेम से दूर ले गया।
“ईश्वर”
कितनी बार यह मुझे
ईश्वर से परे किसी कल्पना में फँसाता रहा।
“आत्मा”,
“समाज”,
“मुक्ति”,
“कर्तव्य”,
“न्याय” —
ये शब्द अब द्वार नहीं रहे,
दीवारें हो गए हैं।
भाषा, जो रचती थी पुल,
अब खाइयाँ बन गई है।
मैं जानता हूँ —
यह मेरी मूढ़ता थी
कि मैंने भाषा को अन्तिम मान लिया।
मैंने समझा कि
जो नहीं कहा जा सका, वह था ही नहीं।
मगर अब
जब मौन मुझे सुनने लगा है,
तो समझ आया —
भाषा मेरी सबसे सुंदर,
और सबसे कपटी आदत रही।
अंतिम संकेत:
मूढ़ता यह नहीं कि मैं भाषा में था—
मूढ़ता यह थी कि
मैंने उसे अंतिम साधन मान लिया,
उसके पार की झिलमिल को न देखा।
अब मैं भाषा को छूता हूँ
जैसे कोई तपस्वी अग्नि को छूता है—
आशंका से, आदर से, और डर से भी।
क्योंकि भाषा
मेरे भीतर की चुप्पी को भी आकार देती है।
मूढ़ बोध गाथा – दो


