मूढ़ बोध गाथा – तीन
विचारधारा की मूढ़ता
(मार्क्स की ओछी और अधूरी समझ से ग्रस्त पूंजीवादी बुद्धिजीवियों पर)
1. मूढ़ता का झंडा
मैं मूढ़ हूँ, और proudly कहता हूँ,
कि इतिहास मेरी जेब में सिक्कों की खनक है।
मार्क्स ने कहा था वर्ग–संघर्ष,
मैंने सुना केवल वर्ग की शराब की बोतलें।
मेरे लिए क्रांति बस एक पंक्ति है,
कक्षा में चिपकी,
और पूंजी मेरी प्रार्थना-पुस्तिका।
2. अधूरी समझ का उत्सव
मैं अधूरा हूँ, जैसे आधा पढ़ा हुआ ग्रंथ।
मार्क्स का दास कैपिटल
मेरे लिए “कैपिटल” पर खत्म हो जाता है।
“दास” शब्द मेरे कानों में मजदूर की चीख बनता है,
और मैं उस चीख को
संगीत की तरह बजाकर
कॉर्पोरेट पार्टी में नाचता हूँ।
3. पूंजीवादी विद्वान की आत्मकथा
मैं विद्वान हूँ –
मेरी आँखों पर चश्मा है,
लेकिन लेंस पर डॉलर की परत जमी हुई।
मैं मार्क्स को पढ़ता हूँ
जैसे कोई रसोइया नमक चखता है—
कम है या ज्यादा?
बाकी थाली भर
लाभ-हानि के मसाले से सजाता हूँ।
4. मूढ़ दर्शन
मैं दार्शनिक हूँ,
लेकिन मेरे दर्शन की जड़ें
कॉफी हाउस की गपशप में हैं।
मजदूर मेरे लिए एक “विचार” है,
जीवित प्राणी नहीं।
क्रांति मेरी कविता का शौक है,
और आरामकुर्सी मेरा कम्यून।
5. वर्ग-संघर्ष का मज़ाक
मैं वर्ग-संघर्ष को
फुटबॉल मैच समझता हूँ।
एक टीम हारी, दूसरी जीती,
और मैं स्टेडियम में सीट पकड़कर
पॉपकॉर्न चबाता हूँ।
मेरे लिए मजदूर का पसीना
सिर्फ़ खेल की नमी है।
6. मूढ़ता की प्रयोगशाला
मेरी प्रयोगशाला में मार्क्स है,
पर वह सिर्फ़ काँच की बोतल में रखा नमूना है।
मैं उसकी मूँछों पर research करता हूँ,
न कि उसकी चेतना पर।
मेरे उपकरणों पर
पूंजी की मुहर लगी है,
और हर परिणाम में
मुनाफ़ा ही निकलता है।
7. अधूरी क्रांति
मैं अधूरी क्रांति का गायक हूँ।
मेरे गीत में मजदूर की जगह
बाजार की धुन बजती है।
मैं “जनता” शब्द को
marketing slogan की तरह बेचता हूँ,
और “क्रांति” को
brand name बना देता हूँ।
8. बौद्धिक बाज़ार
मैं विचारों का दुकानदार हूँ।
मार्क्स की किताबें बेचता हूँ,
जैसे stationery की वस्तुएँ।
मुझे फर्क नहीं पड़ता
कि पन्नों पर खून बहा है,
मुझे तो बस
cover design और कीमत चाहिए।
9. मूढ़ता की अकादमी
मैं प्रोफेसर हूँ,
लेकिन मेरा syllabi
पूंजी का timetable है।
छात्र मुझसे सीखते हैं—
कि मजदूर एक case study है,
जिसे thesis में सजाया जा सकता है।
मैं उनकी मूढ़ता का
डीन हूँ।
10. बोध का व्यंग्य
और अंततः,
मैं स्वीकार करता हूँ—
मेरी मूढ़ता ही मेरी पूंजी है।
मार्क्स की अधूरी समझ
मेरे लिए intellectual property है।
मैं उसे पेटेंट कर
ज्ञान–बाजार में बेचता हूँ।
और जब मजदूर पूछता है:
“सच कहाँ है?”
तो मैं हँसकर कहता हूँ:
“सच वही है जो लाभ देता है।”
मूढ़ बोध गाथा तीन


