“A Garland of Disconnection”

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बिना धागे की माला
   कोहरा मेरा प्रथम गुरु है, जो सृष्टि के प्रथम साँस से पहले था। वह न धुंध है, न छाया। वह वह है, जो न यह है, न वह—नेति-नेति। मैं उसमें खड़ा हूँ, जैसे कोई अनघट बीज, जो मिट्टी को नहीं जानता, फिर भी अनंत की जड़ों में लिपटा है। कोहरा मुझसे फुसफुसाता है, “तू वह है, तत्त्वमसि, पर तू उसे क्यों खोजता है?” मैं चुप रहता हूँ, क्योंकि मेरी आवाज़ उसकी गहराई में डूब जाती है, जैसे कोई तारा, जो आकाश के गर्भ में समा जाए।
   शून्यता एक अनंत का दर्पण है, पर इसमें कोई प्रतिबिंब नहीं। यह वह कोहरा है, जो ब्रह्मांड को जन्म देने से पहले अपने ही भीतर सोया था। मैं उसमें उतरता हूँ, अपने सवालों का बोझ लिए। कौन हूँ मैं? क्या मैं यह देह हूँ, जो कोहरे की गोद में ठिठकती है? या वह चेतना, जो कोहरे के परे भी जलती है, बिना लौ के, बिना राख के? नेति-नेति, मैं कहता हूँ, पर हर बार कोहरा मेरे सवाल को एक नई गहराई में खींच लेता है, जैसे कोई सागर, जो लहरों को अपने ही भीतर समेट लेता है।
   स्वान्वेषण एक तीर्थ है, बिना पथ का, बिना मंजिल का। मैं चलता हूँ, पर मेरे कदम कोहरे के कैनवास पर कोई निशान नहीं छोड़ते। मैं एक अनजन्मी लय हूँ, जो शून्यता के तारों पर थिरकती है। मैं उस अनछुए को छूना चाहता हूँ, जो मेरे भीतर एक तितली की तरह फड़फड़ाता है, पर हर बार वह मेरी उंगलियों से फिसल जाता है, जैसे सुबह का कोहरा, जो सूरज की नज़र पड़ते ही उड़ जाता है। तत्त्वमसि, वह कहता है, पर मैं उसे सुनने से पहले ही अपने भीतर खो जाता हूँ।
   आकाश मेरे सामने नहीं, मेरे भीतर है। वह कोई नीला गगन नहीं, बल्कि कोहरे का आकाश है, जहाँ हर तारा एक अनुत्तरित प्रश्न है। मैं उसमें उड़ना चाहता हूँ, पर मेरे पंख उस आदिम रहस्य से बुने हैं, जो मुझे थाम लेता है। मैं न गिरता हूँ, न उड़ता हूँ—मैं बस हूँ, उस अनंत में, जो न शुरू होता है, न खत्म। नेति-नेति, मैं फुसफुसाता हूँ, पर कोहरा मेरे शब्दों को चुरा लेता है और उन्हें अपने भीतर बिखेर देता है, जैसे कोई प्राचीन मंत्र, जो कभी बोला नहीं गया।
   यह कोहरा मेरा जनक है, मेरा आदि और अंत। यह वह शून्यता है, जो सृष्टि को गढ़ने से पहले थी, और सृष्टि के बाद भी रहेगी। मैं इसके भीतर एक माला हूँ, बिना धागे की, जिसमें हर मनका एक सवाल है, और हर सवाल एक सत्य। मैं उस सत्य को गले लगाता हूँ, जो मेरे भीतर और बाहर, दोनों जगह बिखरा है। तत्त्वमसि, कोहरा कहता है, और मैं उसमें समा जाता हूँ, जैसे एक बूँद, जो सागर में नहीं डूबती, बल्कि सागर बन जाती है।

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