“इंद्रियों के पार का ब्रह्मांड”
मनुष्य—
पाँच द्वारों का एक घर,
जहाँ से वह झाँकता है
अनंत की ओर,
और समझ लेता है—
यही सब कुछ है।
आँखें कहती हैं—
“जो दिखता है, वही सत्य है।”
कान फुसफुसाते हैं—
“जो सुनाई देता है, वही संसार है।”
त्वचा, गंध, स्वाद—
सब अपने-अपने छोटे-छोटे दीपक लेकर
अंधेरे में रास्ता बनाते हैं।
पर क्या
दीपक की लौ ही
सूरज का प्रमाण है?
क्या यह संभव नहीं
कि कहीं कोई प्राणी हो—
जिसके पास
दस, बीस, या अनगिनत इंद्रियाँ हों,
जो देखता हो उन रंगों को
जिनका नाम भी हम नहीं जानते,
सुनता हो उन तरंगों को
जो हमारे कानों के पार बहती हैं?
वह शायद
समय को छू सकता हो,
और दूरी को सूंघ सकता हो,
वह देख सकता हो
विचारों के आकार,
और सुन सकता हो
शून्य का संगीत।
हम जहाँ अंधकार कहते हैं,
वह वहाँ प्रकाश देखता हो,
जहाँ हम शून्य समझते हैं,
वह वहाँ
अनगिनत परतों का स्पंदन पढ़ता हो।
हमारा ब्रह्मांड—
शायद केवल एक झरोखा है,
एक सीमित नक्शा
जिसे हमने अपनी इंद्रियों की स्याही से बनाया है।
और उसके पार—
एक और ब्रह्मांड है,
जो हमें नहीं देखता,
क्योंकि हम उसे देखने में असमर्थ हैं।
कितना विचित्र है—
हम अनंत में रहते हुए भी
सीमित हैं,
और अपनी सीमाओं को ही
अंतिम सत्य मान लेते हैं।
शायद सत्य यह नहीं
कि ब्रह्मांड कितना बड़ा है,
बल्कि यह है
कि हमारी इंद्रियाँ
कितनी छोटी हैं।
और शायद—
किसी दूर अज्ञात लोक में
कोई प्राणी
हमें देखकर मुस्कुराता हो,
जैसे हम
अधूरे स्वप्न हों
किसी पूर्ण जागृति के भीतर।

