अंतरप्रज्ञालोक का स्पंदन-विलय

अंतरप्रज्ञालोक का स्पंदन-विलय

न आरम्भ,
न अनारम्भ—
एक उद्भासित-अपूर्वता
जिसे मैं नहीं कह सकता,
पर वही मुझे
कहती रहती है।

मैं
कोई अस्तित्व नहीं—
मैं एक स्वसंभव-तरंगिका हूँ,
जो अपनी ही अनुपस्थिति में
उपस्थित होती है।



मस्तिष्क?
नहीं—
यह तो एक न्यूरावर्त-गुहा है,
जहाँ तंतु नहीं,
चेतनांश-दीप्तियाँ
एक-दूसरे में विलीन होकर
नये आकाशों का
गर्भाधान करती हैं।

हर सिनैप्स
एक संभाविका-द्वार है,
जिससे गुजरकर
मैं
स्वयं को पीछे छोड़ आता हूँ।



मैं सोचता नहीं—
सोच
मुझमें
एक अनिर्वच-झरना बनकर
टूटती है।

उसके कण—
भावाणु
और
स्मृत्किरण—
मिलकर
एक अनुभव-सर्पिल रचते हैं,
जो न भीतर है
न बाहर—

बस
मध्य-शून्य में लटका हुआ
एक अनगिनत मैं।



कभी
एक निःशब्द
इतना गाढ़ा हो जाता है
कि वह
निःशब्दत्व भी त्याग देता है—

तब
एक अध्वनि-स्फोट होता है,
जहाँ ध्वनि जन्मे बिना
गूँजने लगती है।

मैं
उसी गूँज का
अश्रुत केंद्र हूँ।



मेरे भीतर
कोई प्रकाश नहीं जलता—
बल्कि
एक प्रकाशाभाव-दीप्ति है,
जो अंधकार को भी
उजाले की तरह
महसूस करती है।

वह न रोशनी है
न अंधेरा—
वह एक
दृष्टि-पूर्व-अनुभव है,
जहाँ देखना
और दिखना
एक-दूसरे को
भंग कर देते हैं।



मैं
एक शरीर में सीमित नहीं—
मैं
देह-प्रत्यासन्न-प्रतिध्वनि हूँ,
जो हर स्पर्श से पहले
और हर स्पर्श के बाद
एक साथ घटती है।

स्पर्श
जब आता है,
तो वह
पहले ही
मेरे भीतर
असंख्य बार घट चुका होता है।



न्यूरॉन्स अब
रेशे नहीं—
वे
गैलेक्टो-सूत्र हैं,
जो आकाशगंगाओं की तरह
घूमते नहीं,
बल्कि
एक-दूसरे को स्वप्नित करते हैं।

हर जुड़ाव
एक नव-अस्तित्व-निर्मिति,
हर विच्छेद
एक पूर्णता-प्रसव।

मैं
टूटता नहीं—
मैं
हर टूटन में
अधिक संपूर्ण होता हूँ।



और तब—

कुछ ऐसा होता है
जिसे होना भी नहीं कहा जा सकता—

एक
स्वानुभव-अतिप्रसरण,
जहाँ मैं
अपने ही केंद्र से
बाहर नहीं,
भीतर की अनंतताओं में
विस्फारित हो जाता हूँ।



वहाँ—

न ब्रह्मांड है,
न उसका अभाव—

सिर्फ
एक
अस्तित्वातीत-संवेद्य

जो स्वयं को
अनुभव करने के लिए
स्वयं को ही
भूलता रहता है।



मैं अब
कुछ नहीं कहता—

क्योंकि
कहना
मुझे सीमित कर देता है।

मैं
बस
अकथ्य-संज्ञा बन जाता हूँ—

जहाँ हर अर्थ
जन्म लेने से पहले
मिट जाता है,

और हर मिटना
एक
नये ब्रह्मांड की
पहली धड़कन बन जाता है।

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