होने दो – एक

चीज़ों को होने के लिए
रास्ता दो—

जैसे दिन
रात को देता है अपना आसन
बिना पराजय माने,
बिना घोषणा किए।

और रात भी
सुबह को जगह देती है
जैसे कोई दीपक
अपनी लौ समेटकर
सूरज को सौंप दे आकाश।

रास्ता दो—
जैसे गुलाब
कांटे को अपने साथ रखता है,
उसे सुधारता नहीं,
छुपाता नहीं,
बस सह-अस्तित्व में खिलता है।

जैसे पृथ्वी
बीज से नहीं पूछती—
“तू वृक्ष बनेगा या घास?”
वह बस फटती है,
और जीवन को ऊपर आने देती है।

आकाश
पक्षी से नहीं कहता
किधर उड़ो, कितना उड़ो—
वह खाली रहता है
और उसी खालीपन से
उड़ान जन्म लेती है।

सागर
मछली को तैरना नहीं सिखाता—
वह बस गहरा होता है,
और गहराई ही
गति का गुरु बन जाती है।

होने दो—
क्योंकि रोकना
अक्सर डर का दूसरा नाम है,
और रास्ता देना
विश्वास का।

होने दो—
अपने भीतर भी
विचारों को,
शंकाओं को,
शांतियों को,
टूटनों को।

क्योंकि
अस्तित्व का संगीत
प्रयास से नहीं बजता—
वह तब बजता है
जब हम उँगलियाँ हटाते हैं
और जीवन को
स्वयं बजने देते हैं।

होने दो—
जैसे आकाश
बादलों को होने देता है,
बरसकर मिट जाने तक।

होने दो—
क्योंकि
सबसे गहरा प्रेम
न पकड़ता है,
न सुधारता है—
सिर्फ़ जगह देता है।

और शायद
यही “होने दो”
अस्तित्व की अंतिम करुणा है।

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