पहचान का जाल

सबसे पहले

तुम्हें बताया गया—

तुम कौन हो।

न तुमने पूछा,

न तुम्हें बताया गया

कि कौन बता रहा है।

बस कहा गया—

“यह तुम्हारी पहचान है।”

नाम से शुरू हुआ,

जाति तक पहुँचा,

धर्म में ठहरा,

राष्ट्र पर टिक गया,

और फिर

धीरे-धीरे

तुम्हारी साँसों में घुल गया।

तुम्हें लगा—

यह मैं हूँ।

फिर एक दिन

किसी ने बड़ी सहजता से

कह दिया—

“अगर यह पहचान न रही

तो तुम भी नहीं रहोगे।”

और यहीं

पहचान को

अस्तित्व से जोड़ दिया गया।

अब तुम्हारा होना

तुम्हारे होने से नहीं,

तुम्हारी पहचान से तय होने लगा।

अब तुम्हारा डर

मृत्यु का नहीं,

पहचान के मिट जाने का था।

फिर बताया गया—

“देखो, खतरा है।”

खतरा किसी चेहरे का नहीं था,

किसी हाथ का नहीं था,

किसी हथियार का भी नहीं था—

खतरा

एक विचार था,

एक सवाल था,

एक अलग साँस लेने का साहस था।

पर खतरे की तस्वीर

इतनी बार दिखाई गई

कि तुम्हारी आँखों ने

उसे सच मान लिया।

अब कहा गया—

“बचने के लिए

कुछ नियम ज़रूरी हैं।”

तुम्हें लगा

नियम तुम्हारी रक्षा के लिए हैं,

पर वे

तुम्हारे भीतर

घुसते चले गए।

अब यह नहीं पूछा जाता

कि तुम क्या सोचते हो,

अब यह देखा जाता है

कि तुम कैसे सोचते हो।

धीरे-धीरे

तुम्हारी हँसी पर निगरानी हुई,

तुम्हारी चुप्पी पर शक हुआ,

तुम्हारे सवाल

देशद्रोह हो गए।

अब तुम्हें

खुद से डर लगने लगा—

कहीं तुम ही

खतरा न बन जाओ

अपनी पहचान के लिए।

और सबसे गहरा छल

यह हुआ—

तुमने

नियंत्रण को

अपनी इच्छा समझ लिया।

तुमने

आदेश को

कर्तव्य मान लिया।

तुमने

डर को

देशप्रेम कह दिया।

अब कोई

तुम पर शासन नहीं करता,

अब तुम

खुद पर शासन करते हो।

अब तुम्हारी आत्मा

बिना हथकड़ी के

क़ैद है।

कभी-कभी

रात में

जब सब सो जाते हैं,

और पहचानें

थोड़ी ढीली पड़ती हैं,

तुम्हारे भीतर से

एक आवाज़ उठती है—

“अगर पहचान न होती

तो क्या मैं

कुछ और होता?”

पर तुम

उस आवाज़ को

सुबह तक

ज़िंदा नहीं रहने देते।

यही

नियंत्रण का

सबसे सूक्ष्म तरीका है—

तुम्हें तोड़ा नहीं गया,

तुम्हें बदला नहीं गया,

तुम्हें मारा नहीं गया—

बस

तुम्हें

इतना बताया गया

कि तुम कौन हो,

कि तुम

खुद को

भूल गए।

और अब

अगर कोई कहे—

“पहचान से बाहर भी जीवन है”

तो तुम

घबरा जाते हो।

क्योंकि

कैद से बाहर

सबसे डरावनी चीज़

आजादी होती है।

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