टेंटवाल का कुत्ता
(मंटो की कहानी से उद्भूत)

टेंटवाल का कुत्ता

सीमा के ठीक बीच बैठा है—

न इधर पूरा,

न उधर पूरा।

उसकी आँखों में

दो देशों की थकान है,

और पूँछ में

कोई झंडा नहीं बँधा।

कभी वह

इस तरफ़ की रोटी खाता है,

कभी उस तरफ़ की—

भूख का कोई राष्ट्र नहीं होता।

रात को जब

गोली चलती है,

वह भौंकता नहीं,

चुप हो जाता है—

जैसे जानता हो

कि आवाज़ें

यहाँ जान ले लेती हैं।

उसने देखा है

काँटों में उलझे बच्चे,

बारूदी ज़मीन पर

फिसलती हुई गायें,

और ऐसे जवान

जिनकी उम्र से पहले

उनकी तस्वीरें

दीवारों पर टँग जाती हैं।

टेटवाल का कुत्ता

किसी विचारधारा में

प्रशिक्षित नहीं है,

उसे बस इतना पता है—

कि गोली

माँ नहीं पहचानती।

कभी-कभी

वह सीमा रेखा पर

सीधा लेट जाता है,

जैसे कह रहा हो—

“अगर यह रेखा इतनी पवित्र है

तो मेरे जिस्म से होकर गुज़रो।”

पर कोई नहीं सुनता।

सीमा सुरक्षित रहती है,

कुत्ता असुरक्षित।

सुबह जब सूरज निकलता है,

वह फिर उठ खड़ा होता है—

धूल झाड़ता है,

और दोनों तरफ़

एक-सी नज़र से देखता है।

टेटवाल का कुत्ता

हमसे ज़्यादा समझदार है—

उसे पता है

दुश्मन सामने नहीं होता,

दुश्मन

अक्सर नक़्शों में होता है।

और शायद इसी वजह से

वह आज भी ज़िंदा है—

क्योंकि उसने

कभी किसी को

पराया नहीं समझा।

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