बसंत पंचमी

बसंत पंचमी

आज तन ने
अनायास ही
जाड़े का बोझ उतार दिया है—
कंधे हल्के हैं,
रीढ़ में कोई पुरानी धूप
धीरे-धीरे जाग उठी है।

मन में
कुछ बदल रहा है,
जैसे लंबे मौन के बाद
किसी ने भीतर से खिड़की खोल दी हो
सोच के कोने-कोने में
पीला उजास भरने लगा है।

हाथों में
अकस्मात स्पर्श की स्मृति लौट आई है,
पैरों में
चलने की इच्छा—
बिना मंज़िल पूछे।

बसंत पंचमी
कोई पर्व नहीं,
यह देह का स्वीकार है
कि थकान स्थायी नहीं होती।
यह मन की घोषणा है
कि जीवन फिर से
संभव है।

आज
शब्द भी हल्के हैं,
श्वास भी संगीत है,
और होना—
केवल होना—
पर्याप्त लगने लगा है।

बसंत
तन में ताप नहीं,
मन में आकांक्षा नहीं,
बल्कि
नवीन अनुभूति की
मौन मुस्कान बनकर
उतर आया है।


मृत्यु को बसंत की तरह उतरते देखा है

मैंने मृत्यु को
कभी शोर करते नहीं देखा,
वह बसंत की तरह आई—
चुपचाप,
बिना घोषणा के।

सूखी डालियों पर
एक हल्की हरियाली रख गई,
जो था थका हुआ,
उसे विश्राम दे गई।

पत्ते गिरे नहीं,
अपने-अपने समय पर
मिट्टी में
लौट गए।

हवा में
कोई डर नहीं था,
बस एक नई गंध थी—
जैसे पुरानी पीड़ा
किसी फूल में
बदल गई हो।

मृत्यु यहाँ
अंत नहीं थी,
वह ठहराव थी—
जैसे जीवन ने
आँखें मूँद कर
एक गहरी साँस ली हो।

मैंने देखा है,
बसंत जब उतरता है
तो कुछ रंग
चले जाते हैं,
पर धरती
पहले से अधिक
उपजाऊ हो जाती है।

वैसी ही थी मृत्यु—
न छीनने आई,
बस कह गई:
अब जो बचा है,
वह खिलने के लिए
पर्याप्त है।

बसंत-सी मृत्यु

मृत्यु को बसंत की तरह उतरते देखा है,
जब पुरानी पत्तियाँ झरकर
नई कोंपलों को राह देती हैं।

कोई विदाई नहीं थी उसमें,
बस एक मौसम का
दूसरे मौसम में घुल जाना—
जैसे सर्दी की आखिरी रात
भोर की गुनगुनी धूप में खो जाए।

देखा है उसे फूलों की तरह खिलते,
जब साँसें थमीं
तो चेहरे पर वही शांति थी
जो सेमल के फूल पर होती है
अपनी आखिरी लाली में।

मृत्यु आई थी पीली सरसों के खेत-सी,
हवा में लहराती,
कोई शोक नहीं, कोई रुदन नहीं—
सिर्फ एक पूर्णता,
जैसे आम्र मंजरी की सुगंध
अपने आप में पूरी होती है।

और तब समझ आया
कि अंत भी एक आरंभ है,
मृत्यु भी एक उत्सव—
जब जीवन अपनी पूरी परिपक्वता में
खुद को मिट्टी को सौंप देता है,
ठीक वैसे ही
जैसे बसंत आता है
बिना किसी घोषणा के,
बिना किसी भय के।

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