होना
इस तरह हो
कि एक साँस को
दूसरी का
पता न चले।
मेरे आज को
मेरे कल की
कोई सूचना न हो,
और कल
आज का
उत्तरदायी न बने।
न स्मृति का बोझ,
न भविष्य की
आहट—
बस
होना
होता रहे।
जैसे
लहर उठे
और अगली लहर
यह न जाने
कि उससे पहले
कुछ था।
मैं चाहता हूँ
कि मेरे क्षण
आपस में
परिचित न हों,
वे
एक-दूसरे को
पहचानें नहीं।
न कोई कथा बने,
न कोई क्रम—
बस
मौन का
लगातार
घटित होना।
इतना बिना आवाज़
कि
मेरा होना
खुद को
जगा न सके।
जैसे
अँधेरे में
अँधेरा
और गहरा हो जाए
बिना
किसी संकेत के।
मैं
ऐसा होना चाहता हूँ—
जो
न उपस्थित लगे,
न अनुपस्थित।
सिर्फ़
होना।