मे रा न हो ना

मैं नहीं चाहता

कि मेरे होते हुए

मुझे जाना जाए—

क्योंकि जाना जाना

अक्सर

पकड़ लिया जाना होता है।

मेरे लिए

यह जानना

हिंसा है—

क्योंकि पहचान

अपेक्षा पैदा करती है,

और अपेक्षा

अभाव का बीज।

जब मैं नहीं होऊँगा,

तो लोग

मुझे याद करेंगे—

और स्मृति

दुख की सबसे

सभ्य भाषा है।

मैं नहीं चाहता

कि मेरे न होने से

किसी की आँख

भारी हो,

या किसी की आवाज़

रुक जाए।

मैं चाहता हूँ

कि मैं

इतना हल्का रहूँ

कि मेरी अनुपस्थिति

किसी के जीवन में

वज़न न डाले।

जैसे हवा चली

और निकल गई—

पेड़ ने

शोर नहीं मचाया।

अगर कुछ रह जाए

तो बस

इतना—

कि लोग

अपने भीतर

थोड़ा और

जी सकें।

मेरा न होना

किसी के दुख का

कारण न बने—

यही मेरी

सबसे गहरी

उपस्थिति है।

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