यह कोई खगोल-घटना नहीं,
यह वह क्षण है
जब ब्रह्मांड
अपनी ही आवाज़ से थक जाता है।
बहुत कह लिया था उसने—
विस्फोटों में,
प्रकाश-वर्षों में,
गणनाओं में।
अब वह
एक बिंदु पर आकर
चुप बैठ जाता है।
ब्लैक होल
दरअसल ब्रह्मांड का
मुँह फेर लेना है—
बाहर की ओर नहीं,
भीतर की ओर।
यहाँ कुछ भी
खींचा नहीं जाता,
सब कुछ
खुद गिर पड़ता है—
जैसे ध्यान में
विचार गिरते हैं।
समय यहाँ
घड़ी नहीं पहनता,
वह नंगे पाँव
खड़ा रहता है—
कहीं जाने की
कोई जल्दी नहीं।
प्रकाश
यहाँ अंधा नहीं होता,
वह बस
देखने की ज़िद छोड़ देता है।
ब्लैक होल
कोई अंत नहीं,
यह विराम भी नहीं,
यह वह गहराई है
जहाँ भाषा
अपनी चाबी खो देती है।
यदि ब्रह्मांड
कभी समाधि में जाता है,
तो वही क्षण
ब्लैक होल कहलाता है—
जहाँ अस्तित्व
खुद को
समझाने की कोशिश
छोड़ देता है।
और उसी क्षण
सब कुछ
सच हो जाता है।